राज्यपाल के सामने भी कमियां छिपा ले गया बस्ती मेडिकल कॉलेज

                (नीतू सिंह)

 बस्ती (उ. प्र.)। कहा जाता है कि चोर चोरी से जाएगा, हेराफेरी से नहीं जाएगा। महर्षि वशिष्ठ स्वशाषी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बद्ध ओपेक चिकित्सालय कैली बस्ती (मेडिकल कॉलेज बस्ती) में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। अभी चंद दिनों पहले ही 4 सितम्बर को महामहिम राज्यपाल महोदया के आगमन पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने बड़ी ही चालाकी से अपनी कमियां छिपा लीं। यहां एक ओर राज्यपाल का कार्यक्रम था, दूसरी ओर हमेशा की तरह यहां के डॉक्टर साहिबान अपनी कारगुजारियों में व्यस्त थे। बेलगाम और निडर कुछ डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज को चरागाह समझ लिया है और सरकारी व्यवस्थाओं की भी पूरी कीमत मरीजों की जेब से वसूल कर अपनी जेबें भर रहे हैं। इस मामले में सबसे अधिक चर्चे आर्थोपेडिक डिपार्टमेंट के हैं। 

एक तरफ जिम्मेदारों ने राज्यपाल को मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक भवन तक का भी भ्रमण कराना मुनासिब नहीं समझा, तो दूसरी ओर ओपीडी में बैठे डॉक्टर मरीजों को बाहर की दवाएं लिखते रहे। कुल मिलाकर एक लाइन में कहें तो मेडिकल कॉलेज मरीजों के शोषण का केन्द्र बन गया है, और कुछ लोगों ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है, जिनके ऊपर किसी का कोई जोर नहीं चलता। इसमें हड्डी रोग विभागाध्यक्ष भी अपनी दुकान बहुत अच्छे से चला रहे हैं। बस्ती में मेडिकल कॉलेज की स्थापना और शुरूआत से जनता में काफी उत्साह था। लेकिन उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। जिसे यहां इलाज कराने की जरुरत पड़ जाती है, उसे पता चलता है कि यहां सब बेमानी है। वैसे तो यहां मरीजों को बलि का बकरा बनाने वाले कई हैं, पर हड्डी विभाग के मुखिया जी कुछ और भी खास हैं। ये मरीजों को बाहर की दवाएं जरुर लिखते हैं।
यदि मरीज कुछ कहता है, तो सरकारी दवाओं का मजाक बनाते हुए उसे भयभीत किया जाता है कि जानते हो सरकारी दवाई कैसी होती है। अपने रिस्क पर सरकारी दवा खाईये हमसे न कहना कि फायदा नहीं हुआ।

जिस दिन महामहिम राज्यपाल आनन्दीबेन पटेल जी का यहां अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम था, उस दिन तारकेश्वर टाईम्स ने कैली अस्पताल में आर्थोपेडिक डिपार्टमेंट की पड़ताल की। 
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 जिसमें पाया गया कि इस विभाग की ओपीडी में केवल विभागाध्यक्ष विजय शंकर जी ही मौजूद थे, जो मरीजों को देख रहे थे। ये पर्ची पर अपठनीय भाषा में सरकारी दवाएं लिखते हैं। इनके चेम्बर में इनके साथ 2 - 3 प्रशिक्षु भी थे। पर्ची पर सरकारी दवाएं लिखने के बाद एक दूसरे सादे कागज पर बोल बोल कर प्रशिक्षुओं से प्राईवेट दुकान से लेने के लिए दवाएं लिखवाते हैं। बाद में बाहर बैठा एक व्यक्ति अस्पताल की दवाओं को फेयर करके एक नई पर्ची देता है, जिससे अस्पताल की दवाएं मिलती हैं। लेकिन डॉ. की सख्त हिदायत के आगे सरकारी दवाएं बेमानी मालूम होने लगती हैं। क्योंकि डॉक्टर सहित उनके 2 - 3 स्टाफ मरीज को बाजार से दवाएं लेकर यहां लाकर दिखाकर तभी जाने की हिदायत दे चुके होते हैं।

महर्षि वशिष्ठ स्वशाषी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय बस्ती (मेडिकल कॉलेज बस्ती) के प्राचार्य जी भी कान में तेल डालकर ही बैठे होते हैं। बीते माह आर्थोपेडिक विभागाध्यक्ष का एक कारनामा सुर्खियों में था। इसमें डॉ. विजय शंकर साहब ने पैर का आपरेशन कर मरीज से करीब 20 - 22 हजार रुपए ऐंठ लिए थे। ये पैसे मरीज से ये कहकर लिए गये थे कि प्राईवेट में लखनऊ तक चक्कर काटोगे तब पचासों हजार के खर्चे में जाओगे। यहां सरकारी व्यवस्था में इतने में ही कर दे रहा हूं। इस मामले की शिकायत पर अनभिज्ञता जाहिर करते हुए प्राचार्य ने शिकायतों के बाद भी जैसे प्रकरण का संज्ञान ही नहीं लिया। 

यदि प्राचार्य महोदय ने कुछ भी संज्ञान लेकर कुछ भी कार्यवाही की होती, तो विजय जी की कार्यप्रणाली में जरुर कुछ न कुछ परिवर्तन हुआ होता। ऐसी स्थिति में तह कहना भी गलत न होगा कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन की मिली भगत से कुछ डॉक्टर मरीजों की जेबें काटने का कार्य बेरोक टोक कर रहे हैं।
यहां तक कि एक मरीज को देखने गये सदर विधायक महेन्द्र नाथ यादव ने भी बीते माह यहां कि दुर्व्यवस्था को देखा, शिकायत भी किया। एक विधायक की शिकायतों को भी नजर अंदाज होता देख स्थिति की गम्भीरता और जनहित को देखते हुए विधायक को वहां धरना देना पड़ा। विधायक के मरीज की देखभाल में कुछ सुधार हुआ बस। आश्वासनों के बीच धरना खत्म हुआ। लेकिन फिर हुआ क्या, कुछ नहीं। सब ढाक के तीन पात। बस्ती मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था में सुधार के लिए जन प्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों को विशेष ध्यान देने की जरुरत है, अन्यथा मरीजों की असुविधा और शोषण के साथ साथ यह चिकित्सा इकाई अपनी उपयोगिता खो देगा और बस्ती मेडिकल कॉलेज की पहचान एक बदनाम संस्था की हो जाएगी।

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