महान स्वतंत्रता सेनानी मीरा दत्त गुप्ता : आजादी का अमृत महोत्सव

                 !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज एक महान देशभक्त प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी जोो भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के साथ साथ लगातार 20वर्षों तक विधान सभा सदस्य भी रही थीं। "मीरा दत्त गुप्ता" भारत की एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, राजनेता और कार्यकर्ता थीं।

                                 प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

68 - मीरा दत्त गुप्ता का जन्म ढाका (बांगलादेश) में 05अक्टूबर 1907 को उनकी नानी के घर में हुआ था। उनकी माता का नाम सरजूबाला दत्त गुप्ता तथा पिता का नाम सरत दत्त गुप्ता था। जो (आईएएस) अधिकारी भारत के महालेखा परीक्षक के पद पर सेवारत थे। मीरा दत्त गुप्ता सेंटजान्स और बैथ्यून कॉलेज कोलकाता की मेधावी छात्रा थीं। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एमएससी (गणित) प्रथम श्रेणी द्वितीय में उत्तीर्ण किया था। उनके माता पिता देशभक्ति की भावनाओं से बहुत प्रेरित थे। जब वह बड़ी हो रही थीं तो उन्होंने भी अपने माता पिता के विचारों को आत्मसात कर लिया था।एक सम्पन्न परिवार में जन्म लेने तथा भारत के महालेखा परीक्षक की बेटी होने के बावज़ूद वह युवाओं में देशभक्ति की भावना पैदा करने के लिए क्रान्तिकारियों द्वारा प्रकाशित "बेनु" पत्रिका से जुड़ी हुई थीं तथा महिला क्रान्तिकारियों को बढ़ावा देने वाले संगठन "छत्री संघ" की सचिव भी थीं। पिता के आईएएस अधिकारी होने के कारण वे पुलिस की तलाशी से मुक्त थीं। पुलिस को लम्बे समय तक उनके क्रान्तिकारी होने का संदेह तक नहीं हुआ था।

वे अपने घर में ही गुप्त रूप से क्रान्तिकारी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए दस्तावेज और हथियार गोला बारूद छुपाकर रखती थीं। मीरा दत्त गुप्ता ने मेदिनीपुर में मजिस्ट्रेटों की हत्या में शामिल क्रान्तिकारियों की रक्षा की तथा कवर क्रान्तिकारियों और सक्रिय सदस्यों के बीच संचार का माध्यम थीं। वह अनुशीलन, युगांतर और बंगाल स्वयंसेवकों जैसे भारतीय क्रान्तिकारी समूहों से जुड़ी थींं। बंगाल वालन्टियर्स की सदस्य के रूप में वह पत्रिका "बेनु" महिला अनुभाग की संपादक भी थीं। शुरूआत में उन्हें संगठन के दक्षिण कोलकाता महिला समूह का प्रभारी बनाया गया था। वह अपना सारा वेतन भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में अपनी पार्टी "बंगाल वालन्टियर्स" को दान कर देती थीं। उन्होंने मिदनापुर और राज्य के अन्य हिस्सों में समूह की गतिविधियों पर चर्चा करने के लिए कोलकाता के पास बड़ा नगर में आयोजित बंगाल वॉलन्टियर्स (स्वयंसेवकों) की एक महत्वपूर्ण बैठक में भाग लिया। 1933 से पुलिस को उनकी गतिविधियों पर संदेह हुआ और लगातार उन्हें निगरानी में रखा गया।

सन् 1934 में गवर्नर एंडर्सन शूटिंग मामले में पुलिस द्वारा भवानी भट्टाचार्य और उज्ज्वला मजुमदार जैसे पार्टी के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया था। उसी मामले में पुलिस ने मीरा दत्त गुप्ता से भी कई घंटों तक ज़िरह की थी। इसलिए उनके पिता ने उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें दो साल के लिए कोलकाता से दूर भेज दिया था। दो साल बाद जब वे वापस आयीं तो वह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की सदस्य बन गयीं। वे चार बार लगातार 20 वर्षों तक बंगाल फिर पश्चिम बंगाल विधान सभा की सदस्य (विधायक)भी रही थीं। वह भवानीपुर से पहली विधायक थीं। 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के लिए वे धन जुटाने व राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल होने के कारण उन्हें कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया गया था। जेल से रिहा होने के बाद वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के "फॉरवर्ड ब्लॉक" में शामिल हो गयीं। सन् 1943 के विनाशकारी बंगाल अकाल के दौरान उन्होंने सह काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ अकाल पीड़ितों के लिए राहत के आयोजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

स्वतन्त्रता के बाद उनकी कई गतिविधियों में अकाल बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए राहत गतिविधियाँ और बेघर व आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं का पुनर्वास भी शामिल था। वह विद्यासागर कॉलेज कोलकाता की वॉइस प्रिंसिपल और सुरेन्द्रनाथ कॉलेज कोलकाता के महिला अनुभाग की संस्थापक प्राचार्य के रूप में बहुत प्रसिद्ध थीं। अनुशासन और शैक्षणिक मानकों की अपनी मज़बूत भावना के लिए भी वह काफी लोकप्रिय थीं। सन् 1972 में सुरेन्द्रनाथ महिला कॉलेज से सेवानिवृति के बाद उन्होंने कोलकाता में किशोर न्याय में शांति के मानद न्याय के रूप कार्य किया। पश्चिम बंगाल सहित भारत में कई प्रमुख महिला संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों की संस्थापक थीं तथा पश्चिम बंगाल में फिल्म सेंसर बोर्ड की सदस्य भी थीं। वह अखिल बंगाल महिला संघ की संस्थापक सदस्यों में से थीं। साल 1958 में वह चीन में भारतीय सद्भावना मिशन में शामिल हुईं और बाद में वह शैक्षिक और महिला सम्मेलनों में भाग लेने के लिए बर्लिन कोपेनहेगन और मॉस्को का दौरा भी किया था। पाठ भवन कोलकाता शांतिनिकेतन में विश्वविद्यालय के स्कूल के नाम पर एक स्कूल की स्थापना में भी उनका योगदान था। 18 जनवरी 1983 को निमोनिया हो जाने के कारण 76 वर्ष की आयु में कोलकाता में उनका निधन हो गया।

आइए हम महान देशभक्त शिक्षाविद राजनेता और सामाजिक प्रतिबद्धता के लिए जानी जाने वाली देश की प्रसिद्ध महिला स्वतन्त्रता सेनानी मीरा दत्त गुप्ता जी को याद करें, उनसे प्रेरणा लें! सादर नमन! भावपूर्ण श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!  

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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