पुरानी बस्ती में निकाला गया अलम व मेंहदी का जुलूस : अयोध्या व अम्बेडकरनगर की अंजुमनों ने की नौहाख्वानी

               (बृजवासी शुक्ल) 

बस्ती (उ.प्र.)। पुरानी बस्ती में सोमवार देर रात अलम व मेंहदी का जुलूस निकाला गया। जुलूस में अंजुमने इमामिया जाफरिया अयोध्या व अंजुमने गुनचए अकबरिया अम्बेडकरनगर ने नौहा ख्वानी पेश की। कर्बला के दर्दनाक मंजर को अंजुमन के दस्तों ने नौहे में बयान किया। रसूल के नवासे इमाम हुसैन व उनके घर वालों पर हुए जुल्म का बयान सुनकर हर आंख अश्कबार नजर आ रही थी। कार्यक्रम का आयोजन पुरानी बस्ती की कदीमी संस्था अंजुमन मोईनुल इस्लाम दारूल ऊलूम अहले सुन्नत ने किया।


 विभिन्न चौक व मोहल्लों से होकर अकीदतमंद दक्षिण दरवाजा चौराहे पर जमा हुए, जहां से मुख्य जुलूस देर रात में शुरू हुआ। यहां से चिकवा टोल, मंगल बाजार, बारी टोला, करूआ बाबा चौराहा, नई बाजार होते हुए सुर्ती हट्टा पहुंचकर सलातो सलाम के साथ जुलूस सम्पन्न हुआ। यहां पर कर्बला के शहीदों को खिराजे अकीदत (श्रद्धासुमन) पेश किया गया। समाजसेवी मुबीन कबाड़ी व अन्य लोगों ने सबील का प्रबंध किया था, जिसमें लोगों को पानी व शर्बत पिलाया जा रहा था। जुलूस के सबसे आगे मरहूम हबीब उस्ताद का मशहूर अखाड़ा चल रहा था। इसका नेतृत्व उस्ताद मोहम्मद रजा कर रहे थे। अखाड़े में युवा अपनी कला व हुनर का प्रदर्शन करते हैं। इसी के साथ इसमें लाठी व तलवार की सहायता से युद्ध के कौशल प्रदर्शित किए जाते हैं। अखाड़े के साथ मोहर्रमी धुन गूंज रही थी। मोहर्रमी बाजा विशेषकर मोहर्रम में ही बजाया जाता रहा है। इसे सुनकर लोग यह जान जाते थे, कि अमुक स्थान पर इमाम के मानने वाले जमा होकर उनकी याद मना रहे हैं। अंजुमन के प्रबंधक मुस्तफा हुसैन ने बताया कि हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह इमाम हुसैन की याद मनाए। पैगम्बर ने अपने आखिरी समय में उम्मत से केवल यही मांगा था कि मेरे घर वालों से मोहब्बत के साथ उनकी पैरवी करना। रसूल ने हम तक जो दीन पहुंचाया है, हम पर उनके अहसान का यह बेहतरीन सिला है।  नसीम खान, निजामुद्दीन उर्फ खन्ना, सलमान अहमद शेख, अकबर अली राईनी, अब्बास अली, इरशाद अहमद, रजी अहमद, शमशाद अहमद कल्लू, फिरोज अहमद, गुलाम जीलानी, अब्दुल मन्नान, मास्टर फैसल, सैयद इमाम अशरफ, एजाज अहमद, मो. शफी सलमानी, हैदर अली, अशफाक अहमद, एजाज अहमद, अब्दुल सलाम, अनवर अली, गुलाम सरवर सहित अन्य ने आयोजन में सहयोग प्रदान किया।

कर्बला के नन्हे शहीद की याद मनाई

गांधी नगर में छठवीं का जुलूस निकाला गया। अंजुमने इमामिया की जानिब से कर्बला के नन्हें शहीद हजरत अली असगर की याद में हर साल छठवीं मोहर्रम को झूले का जुलूस निकाला जाता है। कर्बला में शहीद हुए 72 लोगों में यह सबसे छोटे थे। हजरत अली असगर की शहादत को कर्बला में इमाम की ओर से पेश की गई कुर्बानी पर मुहर कहा जाता है।

इमामबाड़ा शाबान मंजिल में आयोजित मजलिस को सम्बोधित करते हुए मौलाना मोहम्मद हैदर खां ने कहा कि इमाम के सबसे छोटे बेटे हजरत अली असगर की कर्बला में उम्र छह माह थी। तीन दिन तक प्यासा रहने के बाद अली असगर की जुबान ऐंठ गई और ऐसा महसूस हो रहा था कि बच्चा अब मर जाएगा। इमाम मजबूर होकर अली असगर को गोद में लेकर कर्बला के मैदान में आए और यजीदी फौज से कहा कि इस बेगुनाह को दो घूंट पानी पिला दो, इस बच्चे की कोई खता नहीं है। सरकश यजीदियों ने इस मासूम की प्यास बुझाने के बजाए तीर चलाकर उसे शहीद कर दिया। मासूम ने अपने बाप की गोद में दम तोड़ दिया। यह मंजर दुनिया को दहलाने वाला है। इमाम ने अपने इस मासूम के शव को कर्बला में दफन कर दिया था। 11 मोहर्रम को यजीदियों ने कर्बला की जमीन में भाले चुभो-चुभो कर अली असगर के शव को ढूढकर निकाल लिया। मासूम का सिर काट कर अन्य शहीदों में इसे शामिल कर दिया। इमामबाड़ा खुर्शीद हसन, इमामबाड़ा सगीर हैदर, इमामबाड़ा रियाजुल हसन व इमामबाड़ा लाडली मंजिल में भी मजलिस आयोजित हुई। सुहेल हैदर, सोनू, मोहम्मद रफीक व अन्य ने नौहा ख्वानी पेश किया। 

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