महान स्वतंत्रता सेनानी राजकुमारी गुप्ता : आजादी का अमृत महोत्सव

 

                  !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज मैं देश की उस बहादुर क्रान्तिकारी बेटी की बात कर रही हूँ जिन्हें देश की आज़ादी के लिए अँग्रेजों से लड़ाई लड़ने के साथ साथ अपने समाज से भी लड़ना पड़ा था। आज़ादी के संघर्ष में दोहरा संघर्ष झेलना पड़ा जब "काकोरी कांड" में गिरफ्तार होने पर ससुराल वालों ने अख़बार में संदेश प्रकाशित कर उन्हें परिवार से बेदखल कर दिया था। स्वतन्त्रता की लड़ाई में कई बार जेल जाने वाली देश के लिए मर मिटने वाली महान महिला स्वतन्त्रता सेनानी हैं "राजकुमारी गुप्ता"

                                    प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

74 - राजकुमारी गुप्ता "देश की स्वतन्त्रता के लिए हमें जो करना था हमने किया तथा हम ऊपर से गाँधीवादी और नीचे से क्रान्तिकारी हैं" उक्त बात कहने वाली और स्वतन्त्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बेहद साहसी महान क्रान्तिकारी राजकुमारी गुप्ता राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की अहिंसावादी सोच के साथ साथ अँग्रेजों के खिलाफ़ क्रान्तिकारियों द्वारा सशस्त्र विद्रोह के विचारों से भी सहमत थींं। जैसे जेसे वह स्वतन्त्रता आन्दोलनों में भाग लेने लगीं उन्हें लगने लगा था कि सिर्फ अहिंसा के मार्ग पर चलने से आज़ादी नहीं मिलेगी अथवा सिर्फ बातों से हम स्वतन्त्र हो ही नहीं सकेंगे। यदि देश को स्वतन्त्र कराना है तो स्वतन्त्रता के लिए हथियार भी उठाने ही पड़ेंगे। राजकुमारी गुप्ता का जन्म कानपुर के बाँदा जिले में सन् 1902 में हुआ था। उनकी माता पर्दा प्रथा करती थीं तथा पिता की एक छोटी सी पंसारी की दूकान थी।

बाल्यावस्था में ही राजकुमारी गुप्ता की शादी कानपुर के मदन मोहन गुप्ता से कर दी गयी जो काँग्रेस पार्टी के एक सक्रिय सदस्य थे। पति आज़ादी की लड़ाई लड़ रही काँग्रेस से जुड़े थे। इसलिए स्वाभाविक रूप से राजकुमारी गुप्ता भी अपने पति का सहयोग करने लगीं। दोनों पति पत्नी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी के आदर्शों, विचारों और सिद्धान्तों से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गाँधी जी के आह्वान पर वे दोनों (पति-पत्नी) स्वतन्त्रता संग्राम में शामिल हो गए। महात्मा गाँधी जी के अहिंसावादी विचारों का राजकुमारी गुप्ता पर काफी प्रभाव था। परन्तु जैसे जैसे स्वतन्त्रता आंदोलनों में भाग लेती गयीं उन्हें अँग्रेजों का अत्याचार अमामवीय और असहनीय लगने लगा। उन्हें यह भी महसूस हुआ कि केवल अहिंसा के मार्ग पर चलने से ही हम स्वतन्त्र नहीं हो सकेंगे हमें अँग्रेजों को हथियारों की ताकतों से भी परिचय कराना होगा। सन् 1924 में असहयोग आन्दोलन अचानक रूकने के साथ राजकुमारी गुप्ता क्रान्तिकारी विचारों से और अधिक आकर्षित हुईं और महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद जी से जुड़ गयीं। जिसका नेतृत्व बाद में महान क्रान्तिकारी भगत सिंह जी ने किया था।
अपने पति और ससुराल वालों की जानकारी के बिना वे चन्द्रशेखर आज़ाद जी की पार्टी "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" की सदस्यता ग्रहण कर ली तथा उनकी गुप्त सूचनाएँ और सामग्री एक जगह से दूसरी जगह (क्रान्तिकारियों) में पहुँचाना शुरू कर दिया। नौ अगस्त 1925 को जब क्रान्तिकारियों द्वारा लखनऊ के पास काकोरी ट्रेन लूट कांड को अंजाम दिया गया था, जिसमें सरकारी धन को लूटा गया था। उक्त "काकोरी लूट कांड" की योजना "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" ने बनाई थी। उस कांड से राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाकउल्ला खाँ एवम् राजेन्द्र लहरी आदि क्रान्तिकारी जुड़े थे। उनका विचार था कि अँग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष हेतु धन प्राप्त करने के लिए रेलवे स्टेशनों से एकत्रित धन लेकर जा रही लखनऊ वाली ट्रेन को रास्ते में लूटकर सरकारी धन को क्रान्तिकारी कामों में लगायी जाए। क्रान्तिकारियों के उस सफल मिशन में राजकुमारी गुप्ता की अहम भूमिका थी। काकोरी ऑपरेशन में शामिल राष्ट्रवादियों और क्रान्तिकारियों को बन्दूक व रिवॉल्वर आदि हथियार पहुँचाने की ज़िम्मेदारी राजकुमारी गुप्ता को ही सौंपा गया था। तभी उस काम को इतनी सफाई से अंजाम दिया जा सका। राजकुमारी गुप्ता की गिरफ्तारी तब हुई जब वह अपने कपड़ों में आग्नेयास्त्र (हथियार) छिपाकर अपनी तीन साल की बेटी के साथ खेतों से गुज़र रही थीं। तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके घर वालों को जब उनका सच पता चला कि वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से भी जुड़ी हुई थीं और गिरफ्तार कर ली गयीं तब उनकी गिरफ्तारी की ख़बर सुनते ही उनके ससुराल वालों ने उनका साथ छोड़ दिया तथा बकायदा एक स्थानीय समाचार पत्र "वीर भगत" में यह दावा भी किया कि उनका राजकुमारी गुप्ता के साथ कोई रिश्ता नहीं।
ससुराल वालों के बहिष्कार के बाद राजकुमारी गुप्ता के लिए बहुत ही पीड़ादायी समय था। वह अकेली हो गयी थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह अपनी राह चलती रहीं और देश की आज़ादी के लिए अपना योगदान देती रहीं। उनका कहना था कि "वह ऊपर से गाँधीवादी और नीचे से एक क्रान्तिकारी थीं। उन्हें जो करना था उन्होंने किया" उन्हें कोई पछतावा नहीं था। बल्कि स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी भूमिका पर उन्हें गर्व था। राजकुमारी गुप्ता के विचारों में महात्मा गाँधी और चन्द्रशेखर आज़ाद दोनों की छाप थी। देश की स्वतन्त्रता की लड़ाई में 1930 से 1942 तक सरकार विरोधी कामों के लिए वे कई बार जेल गयीं और देश के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। राजकुमारी गुप्ता की देशभक्ति और बहादुरी हमारे लिए प्रेरणादायक है।

कानपुर के बाँदा उत्तर प्रदेश की महान क्रान्तिकारी राष्ट्रभक्त बहादुर बेटी को आइए हम सैल्यूट करें! उनसे प्रेरणा लें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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