नाना का दीन बचाने के लिए इमाम हुसैन ने दी थी कुर्बानी, इमामबाड़ों में मजलिसें शुरु

 

                            (संतोष दूबे) 

अरबी महीने मोहर्रम में शाबान मंजिल व अन्य इमामबाड़ों में मजलिसें शुरू हो गई हैं। नौहा व मातम कर सोगवारों द्वारा शहीदों का गम मनाया जा रहा है। इमाम हुसैन ने नाना की दीन बचाने के लिए कुर्बानी दी थी।

बस्ती (उ.प्र.)। इमामबाड़ा शाबान मंजिल सहित इमामबाड़ा एजाज हुसैन, इमामबाड़ा सगीर हैदर, इमामबाड़ा रियाजुल हसन खां, इमामबाड़ा खुर्शेद हसन में मजलिसों का सिलसिला जारी है। मजलिसों में सोगवार नौहा व मातम कर कर्बला के शहीदों का गम मना रहे हैं।

इमामबाड़ा शाबान मंजिल में आयोजित मजलिस को खिताब फरमाते हुए मौलाना मोहम्मद हैदर खां ने कहा कि इमाम हुसैन अपने नाना पैगम्बरे-इस्लाम का दीन बचाने के लिए कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी पेश करने के लिए आए थे। उन्होंने बचपने में अपने नाना से इस अजीम कुर्बानी का वादा किया था, और कर्बला में वही वादा वफा किया। 

मौलाना हैदर ने कहा कि इमाम अली, इमाम हसन व हजरत जहरा के कातिल नकाब में छुपे रह गए, लेकिन हुसैन ने अपने कातिल को रहती दुनिया तक के लिए बेनकाब कर दिया। शराब के नशे में चूर रहने वाला व जुए के शौकीन यजीद के जुल्म के खौफ से उस समय के अनेक धर्मगुरु या तो अंडरग्राउंड हो गए थे, या उन्होंने यजीद के सामने समर्पण कर दिया था।

यजीद ने यह हुक्म दिया था कि हुसैन या तो उसकी खिलाफत को कबूल करें या उन्हें मार दिया जाए। इमाम ने यजीद के सामने समर्पण करने से बेहतर शहीद होना समझा। हुसैन अगर यजीद को खलीफा मान लेते तो आज दुनिया में हकीकी इस्लाम का नाम लेने वाला कोई नहीं होता। इस मौके पर मौलाना अली हसन, हाजी अनवार काजमी, राजू, जीशान रिजवी, शम्स आबिद, अन्नू, तकी हैदर, रफीक अहमद, सुहेल हैदर, सफदर रजा सहित अन्य लोग मौजूद रहे। 

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