महान स्वतंत्रता सेनानी सुशीला देवी : आजादी का अमृत महोत्सव

             !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज एक ऐसी क्रान्तिवीर महिला वीरांगना हैं जिन्होंने स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अपनी जान पर खेलकर अँग्रेजों से शहीद "भगत सिंह" को बचाया था, तथा काकोरी कांड मामले में फँसे क्रान्तिकारियों को बचाने के लिए मुकदमे की पैरवी के लिए धन की आवश्यकता को देखते हुए अपनी माँ द्वारा अपनी शादी के लिए रखा गया दस तोला सोना वकील को दे दिया था। ऐसी महान क्रान्तिकारी महिला वीरांगना हैं "सुशीला देवी" (सुशीला मोहन) उर्फ (सुशीला दीदी)।

                                     प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

69 - सुशीला दीदी एक महान देशभक्त महिला स्वतन्त्रता सेनानी थीं, जिन्हें महान क्रान्तिकारी भगत सिंह अपनी बड़ी बहन मानते थे और दीदी कहकर बुलाते थे। उनके साथ सभी क्रान्तिकारी उन्हें सुशीला दीदी कहकर सम्बोधित करने लगे और वे "सुशीला दीदी" के नाम से जानी जाने लगीं। उनका जन्म तत्कालीन पंजाब के दत्तोचूहड़ (अब पाकिस्तान में) पांच मार्च 1905 को हुआ था। सुशीला दीदी जब किशोरावस्था में थीं तभी माँ का देहावसान हो गया था। उनके पिता का नाम करमचन्द था, जो अँग्रेजों की सेना में मेडिकल अफसर थे। डॉ. करमचन्द को विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखकर अँग्रेजों से घृणा हो गयी थी, और यही कारण था कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी "राय साहब" की उपाधि अस्वीकार कर दी थी।

 सुशीला दीदी दो भाई और तीन बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनकी शिक्षा जालन्धर आर्यकन्या महाविद्यालय से हुई थी। उन्हें देशभक्ति की प्रेरणा भी उसी विद्यालय की प्राचार्य रहीं कुमारी लज्जावती से मिली थी। वे पढ़ाई के साथ साथ कई क्रान्तिकारी संगठनों से भी जुड़ गयी थीं। अपने अध्ययनकाल के दौरान ही वे स्वतन्त्रता आंदोलन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए जुलूस को बुलाना, क्रान्तिकारियों को गुप्त सूचनायें पहुँचाना, लोगों में जागरूकता फैलाने, क्रान्ति की ज्वाला आम जनमानस में जगाने के लिए पर्चे आदि बाँटने एवम चन्दा इकट्ठा करने में संलग्न हो गयी थीं। उनकी देशभक्ति को देखकर उनके स्कूल की प्राचार्य कुमारी लज्जावती ने उनकी भेंट दुर्गा भाभी से कराई। धीरे धीरे दोनो लोगों की घनिष्ठता इस कदर बढ़ी कि उनके बीच ननद भाभी का रिश्ता बन गया। सबसे पहले दुर्गा बोहरा को दुर्गा भाभी कहकर सुशीला दीदी ने ही सम्बोधित किया था, तभी से सभी क्रान्तिकारियों की सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी हो गयी थीं। वर्ष 1926 में देहरादून में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर पहली बार उनकी मुलाक़ात सरदार भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा (दुर्गा भाभी के पति) और बलदेव से हुई। सुशीला देवी ने भगत सिंह को अँग्रेजों से बचाया था। अँग्रेज अधिकारी उनके पीछे लगे हुए थे उस दौरान उनसे बचने के लिए वह जालन्धर आए तो सुशीला दीदी व अन्य छात्राओं ने उन्हें हॉस्टल के कमरे में छुपा दिया था। उन्नीस दिसम्बर 1927 को जब काकोरी कांड के क्रान्तिकारियों को फाँसी की खबर सुशीला दीदी को मिली तो वे ख़बर सुनकर ही बेहोश हो गयी थीं। उस समय वह स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा थीं।
सुशीला दीदी ने काकोरी कांड के क्रान्तिकारियों को बचाने के लिए अपनी माँ द्वारा अपनी शादी के लिए रखे गए 10 तोले सोने को मुकदमे की पैरवी के लिए वकील को दे दिया था। इसके अलावा उन्होंने क्रान्तिकारियों का केस लड़ने के लिए मेवाड़पति नामक नाटक खेलकर भी चन्दा इकट्ठा किया था। पिता ने विरोध किया और राजनीति से दूर रहने की सलाह दी तो उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन की राह को न छोड़ते हुए घर छोड़ने का ही फैसला कर लिया। वे स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कोलकाता चली गयीं। वहीं उन्होंने शिक्षिका की नौकरी कर ली, लेकिन कोलकाता में रहते हुए भी वह देश प्रेम से विमुख नहीं हुई। वह गुप्त रूप से क्रान्तिकारियों की मदद करती रहीं। वर्ष 1927 में साइमन कमीशन का विरोध करने पर लाठी चार्ज से घायल हुए लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने का क्रान्तिकारियों ने निर्णय लिया। उन्होंने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध किया। वर्ष 1928 में ब्रिटिश पुलिस अफसर सांडर्स को मारने के बाद भगत सिंह और दुर्गा भाभी जब भेष बदलकर लाहौर (अब पाकिस्तान मेंं) से कोलकाता पहुँचे, तो भगवती चरण बोहरा और सुशीला दीदी ने उनका स्वागत किया तथा कोलकाता में ठहरने का इंतज़ाम भी किया था। आठ अप्रैल 1929 को केन्द्रीय असेम्बली दिल्ली में बम फेंकने से पूर्व भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जिन तीन लोगों से मिले थे। उनमें दुर्गा भाभी, भाई भगवती चरण बोहरा और सुशीला दीदी का नाम शामिल था। लाहौर षडयन्त्र केस में गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह की पैरवी के लिए फंड जुटाने से लेकर चन्द्रशेखर आज़ाद की सलाह पर भगत सिंह और उनके साथियों को छुड़ाने के लिए "गाँधी इरविन समझौता" में भगत सिंह की फाँसी को कारावास में बदलने की शर्त लेकर सुशीला दीदी ही महात्मा गाँधी जी से मिलने तक गयीं, किन्तु महात्मा गाँधी ने साफ इन्कार कर दिया था। वर्ष 1930 में सविनय अवग्या आन्देलन में इन्दुमति के छद्म नाम से सुशीला दीदी ने भाग लिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वर्ष 1932 में क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण सुशीला दीदी को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि छ: माह के कारावास के बाद छोड़ दिया गया।
वर्ष 1933 में एक काँग्रेस कार्यकर्ता व दिल्ली के क्रान्तिकारी साथी रहे श्याम मोहन जो पेशे से वकील भी थे, उनसे सुशीला दीदी ने विवाह कर लिया और शादी के बाद दिल्ली चली गयीं। उन्होंने अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों को जारी रखा। वे दिल्ली में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस में शामिल हो गयी थीं, लेकिन उन्होंने क्रान्तिकारी गतिविधियों को नहीं छोड़ा। सन् 1937 में जब अंडमान जेल में बंद कई काकोरी क्रान्तिकारियों को रिहा किया गया तो सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी ने दिल्ली में उन्हें सम्मानित करने के लिए राजनीतिक रैली की योजना बनायी। चूँकि दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी दोनों ही काँग्रेस की सदस्य थीं, इसलिए महात्मा गाँधी जी के विरोध का सामना करना पड़ा था। साल 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी भाग लेने के कारण सुशीला दीदी अपने पति के साथ जेल गयीं। सन् 1947 अँग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के बाद सुशीला दीदी ने गरीब और असहाय स्त्रियों की सहायता के लिए दिल्ली में महिला हस्तशिल्प विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने कुछ समय के लिए दिल्ली नगर निगम की सदस्य के रूप में भी काम किया और दिल्ली काँग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रहीं, परन्तु आर्थिक अभाव व खराब स्वास्थ्य के कारण 13 जनवरी 1963 को उनका निधन हो गया। आज चाँदनी चौक के खारी बावली में "सुशीला मोहन मार्ग" नाम से एक सड़क मौजू़द है, लेकिन सुशीला मोहन के विषय में बहुत कम लोग जानते हैं।

 गुमनाम क्रान्तिकारी महान वीरांगना सुशीला देवी (सुशीला मोहन) उर्फ सुशीला दीदी को आइए हम याद करें! उनसे प्रेरणा लें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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