महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी सरस्वती देवी : आजादी का अमृत महोत्सव

 

               !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान जेल जाने वाली बिहार की पहली महिला स्वतन्त्रता सेनानी जो देश की आज़ादी की लड़ाई में अपनी प्रसव पीड़ा को भी भूल गयी थीं। भारत छोड़ो आंदोलन के कारावास के दौरान उन्होंने अपने बच्चे को जन्म दिया था। ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए हर आंदोलन में बढ़ - चढ़कर हिस्सा लिया तथा कई बार जेल गयी थीं। सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध भी अपनी आवाज़ बुलन्द करती रही थीं और "देवी जी" के नाम से प्रसिद्ध हुईं। महान क्रान्तिकारी और समाजसेविका महिला सेनानी हैं "सरस्वती देवी"

                                 प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

72 - सरस्वती देवी देश को आज़ाद कराने के लिए आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने वाली और जेल जाने वाली झारखंड बिहार की पहली महान क्रान्तिकारी महिला सेनानी थीं। उनका जन्म अविभाजित बिहार के हजारीबाग (अब झारखंड में) जिला के बिहारी दुर्गा मंडप के पास 05 फरवरी 1901को हुआ था। उनके पिता का नाम राय विष्णु दयाल लाल सिन्हा था। जो संत कोलंबा महाविद्यालय, हजारीबाग में उर्दू, अरबी और फारसी भाषा के प्रोफेसर थे। मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में ही सरस्वती देवी का विवाह हजारीबाग के दारू गाँव निवासी भैया बैजनाथ सहाय के पुत्र केदारनाथ सहाय के साथ हुआ। विवाह के बाद सरस्वती देवी ससुराल आ गयीं। उनकी पढाई घर में ही हुई थी। बचपन से ही वह सामाजिक अंधविश्वास, रूढ़ियों समेत समाज में विभिन्न प्रकार की व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलन्द करती रही थीं। पर्दा प्रथा तोड़ने के बाद समाज ने उन्हें प्रताड़ित किया तथा उनके पति केदारनाथ सहाय को स्वजाति समाज में सामूहिक भोज से उठा दिया गया था। उसके बावज़ूद सरस्वती देवी और उनके पति केदारनाथ सहाय ने सामाजिक बुराइयों से कोई समझौता नहीं किया था। सरस्वती देवी के पति एक वकील थे और हजारीबाग में वकालत करते थे। उस दौरान वह डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी की "बिहार स्टूडेन्ट वेलफेयर सोसाइटी" से जुड़े। सोसाइटी के कार्यकर्ता उनके घर आया करते थे तो सरस्वती देवी भी उनलोगों से बात करती थीं। देश की आज़ादी पर चर्चा करती थीं।

घर में राजनीतिक माहौल मिलने के बाद सरस्वती देवी ने भी स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने की इच्छा ज़ाहिर की और वर्ष 1916 - 17 में ही वे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गयीं। साथ ही समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, शोषण व अन्य सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध महिलाओं को जगाना भी शुरू कर दिया था। अब उनकी पहचान आसपास एक स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में बनने लगी। लोगों का ध्यान उनके कामों पर गया और वह लोगों के बीच "देवी जी" के नाम से प्रसिद्ध हो गयीं। सन् 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी के आह्वान पर उन्होंने "असहयोग आन्दोलन" में हिस्सा लिया और शालिग्राम सिंह, के.बी. सहाय, बजरंग सहाय और त्रिवेणी सिंह आदि अपने साथियों के साथ गिरफ्तार कर ली गयीं और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद वे चर्खा और खादी के प्रचार में पुन: जुट गयीं। अपने स्वाधीनता सेनानी साथियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलींं। साल 1925 में जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी हजारीबाग आए थे और मटवारी मैदान में भाषण दिए थे, उसी दौरान सरस्वती देवी पहली बार महात्मा गाँधी जी से मिली थीं। वर्ष 1928 में सरस्वती देवी ने के.बी. सहाय के साथ मिलकर पर्दा प्रथा के खिलाफ हजारीबाग में आंदोलन चलाया। उन्होंने बिना पर्दा के रिक्शा में सवार होकर पूरे शहर में घूमकर पर्दा प्रथा को हटाने का संदेश दिया था, जिसे देखकर शहर की महिलाएँ भी जागरूक और प्रभावित हुई थीं।
छब्बीस (26) जनवरी 1930 को जब भारत के हर क्षेत्र में तिरंगा झंडा फहराया जाना था, उस दौरान पुलिस लाठी चार्ज के बावज़ूद के.बी. सहाय और सरस्वती देवी के नेतृत्व में ब्रिटिश झंडा हटाकर तिरंगा झंडा फहराया गया। उस दौरान वे फिर जेल गयीं। साल 1930 नमक आन्दोलन के दौरान सरस्वती देवी और के.बी. सहाय ने हजारीबाग के खजांची तालाब में नमक बनाकर नमक कानून को चुनौती दी थी। उस दौरान भी उन्हें 06 माह के लिए जेल की सजा हुई थी। उस समय दो और महिला क्रान्तिकारी मीरा देवी और साधना देवी को भी जेल भेजा गया था। "सविनय अवग्या आंदोलन" 08 मार्च 1932 को गिरिडीह के डुमरी में सरस्वती देवी ने 600 संताल आंदोलनकारियों के समूह को सम्बोधित किया था। सन् 1937 - 1939 तक वे भागलपुर से चुनाव जीतकर बिहार विधान सभा की सदस्य रहीं। सन् 1940 में भी एक जुलूस निकालने के आरोप में वह गिरफ्तार कर ली गयी थीं। पुन: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो वे गर्भवती थीं और कारावास के दौरान ही उन्होंने अपने बच्चे को जन्म दिया था। जिसका नाम द्वारिकानाथ सहाय रखा।
पन्द्रह (15) अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ था तो सरस्वती देवी ने पूरे हजारीबाग में घूम घूमकर मिठाईयाँ बाँटी थीं। वर्ष 1947 से 1952 तक वह भागलपुर से एमएलसी भी चुनी गयीं। इसके अलावा विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने देश की सेवा की। वह हजारीबाग जिला काँग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रहींं। वे हजारीबाग चरखा समिति की अध्यक्ष रहीं। हजारीबाग महिला समिति की अध्यक्ष रहीं तथा बिहार हरिजन संघ की सदस्य भी थीं। हालांकि अस्वस्थ रहने के कारण वर्ष 1952 में ही उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया था। उन्होंने कुछ दिनों तक मथुरा, वृन्दावन और अयोध्या की यात्रा कर तीर्थाटन किया। एक अक्टूबर 1958 को मात्र 57 वर्ष की उम्र में वह दुनिया से विदा हो गयीं। 

देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली तथा जेल जाने वाली झारखंड बिहार की पहली महिला महान स्वतन्त्रता सेनानी और समाजसेविका को आइए हम याद करें! उन्हें सैल्यूट करें! उनसे प्रेरणा लें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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