पं. रामप्रसाद बिस्मिल ने जंग ए आजादी में किताबें बेचकर खरीदे थे हथियार : जयंती पर विशेष

  

                  (भृगुनाथ त्रिपाठी 'पंकज') 

स्वतंत्रता आंदोलन में अपने क्रांतिकारी गतिविधियों से अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे एक कवि के साथ साथ अच्छे अनुवादक भी थे। सन् 1925 के काकोरी कांड में भी इनकी मुख्य भूमिका रही। भारतमाता के लिए उनके जोश और जुनून का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने किताबें बेचकर स्वाधीनता आन्दोलन को और मजबूत करने के लिए शस्त्र खरीदे थे। ऐसे महान क्रांतिकारी आजादी के दीवाने पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल को नमन करते हुए दिव्य श्रद्धांजलि।

11 जून, 1897 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में जन्मे क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया था। कहा जाता है उन्होंने साल 1913 में अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत की थी। इस दौरान वह उस समय के आर्य समाज और वैदिक धर्म के प्रमुख प्रचारकों में से एक भाई परमानंद, जो गदर पार्टी में सक्रियता के बाद हाल ही में वापस स्वदेश लौटे थे। इन्हें गिरफ़्तार कर गदर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। रामप्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी रूप से तो लोग परिचित हैं, लेकिन इस बात को बहुत का लोग ही जानते हैं कि वह संवेदशील कवि या शायर, साहित्यकार व इतिहासकार होने के साथ-साथ एक मल्टी-लिंगुअल (Multi-lingual) ट्रांसलेटर थे। उन्होंने अपने लेखन और कविता संग्रह में ‘बिस्मिल’ नाम के अलावा दो उपनाम ‘राम’ और ‘अज्ञात’ नाम का भी प्रयोग भी किया है। किसी फ़िल्म का एक मशहूर डायलॉग है कि, ‘जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए’ ये बात बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों पर बहुत सटीक बैठती है। बिस्मिल ने अपने तीस साल के जीवन में कुल 11 पुस्तकें प्रकाशित की थीं, लेकिन अंग्रेजों ने उनकी सारी पुस्तकें ज़ब्त कर ली।

रामप्रसाद बिस्मिल को एक चीज बहुत खास बनाती है। दरअसल, उन्होंने अपने जरूरी हथियारों की खरीद अपने पुस्तकों की बिक्री से मिले पैसों से की थी। बिस्मिल के विषय में ये भी कहा जाता है कि उन्होंने अहमदाबाद के अधिवेशन में कांग्रेस की साधारण सभा में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित करवाने में अहम योगदान दिया था।

वह ‘असहयोग आंदोलन’ को सफल बनाने के लिए अपनी ओर से पूर्ण प्रयास में थे, लेकिन चौरीचौरा कांड के बाद अचानक असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद देश में फैली निराशा को देखकर उनका कांग्रेस के आजादी के अहिंसक प्रयासों से विश्वास सा ही उठ गया।

इसके बाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेना शुरू कर दिया। इस संघर्ष की लड़ाई में उन्हें हथियारों जैसी जरूरत के लिए पैसों की कमी महसूस हुई और इसी कड़ी में काकोरी कांड होता है। नौ अगस्त, 1925 को बिस्मिल ने अशफाक उल्लाह ख़ान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रौशन सिंह और अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर काकोरी में ट्रेन से ले जाये जा रहे सरकारी ख़जाने की लूट को अंजाम दिया।

दुर्भाग्यवश वह 26 सितंबर, 1925 को पकड़े गए और उनपर मुकदमा चलाया गया। काकोरी ट्रेन लूटपाट के लिए उन्हें फांसी की सज़ा दे दी गई। उनके साथ उनके साथियों अशफ़ाक उल्लाह खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रौशन सिंह को भी फांसी की सज़ा मिली। लेकिन, अपने आखिरी समय में भी इन चंद लाइनों को कुछ इस जोशीले अंदाज़ में गाया कि आज भी कई लोग सरफ़रोशी की तमन्ना को उनकी ही रचना समझते हैं। रामप्रसाद बिस्मिल का आज़ादी की लड़ाई में अहम योगदान है जिनके बारे में जानकर भावी पीढियाँ गर्व का अनुभव करेंगी।

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