आजादी की दीवानी वीर महिला कल्पना दत्त : आजादी का अमृत महोत्सव

                     !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज- "वीर महिला" की उपाधि से सम्मानित महिला क्रान्तिकारी जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। जिन्हें मात्र 21वर्ष की उम्र में मिली थी उम्र कैद की सज़ा। लड़कों के वेश में अँग्रेजों से लड़ने वाली वीर क्रान्तिकारी महिला सेनानी हैं "कल्पना दत्त"

                               प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

51 - कल्पना दत्त अँग्रेजों का डटकर मुकाबला करने वाली वीर बालिका ने महज 14 वर्ष की उम्र में अपने ओजस्वी भाषण से लोगों में शक्ति का आभास कराया था। मात्र 18 वर्ष की उम्र में जंग-ए-आज़ादी में कल्पना दत्त ने बन्दूक उठा ली थी। उन्होंने अँग्रेजों की कमर तोड़ दी थी। इस वीर क्रान्तिकारी महिला का जन्म चटगाँव के एक गाँव श्रीपुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में 27 जुलाई 1913 को हुआ था। श्रीपुर गाँव अब बांगलादेश के हिस्से में है। उनकी माता का नाम शोभना देवी और पिता का नाम विनोद बिहारी दत्त था। कल्पना के दो चाचा स्वतन्त्रता आन्देलन में सक्रिय थे। वे उनसे काफी प्रेरित थीं।

कल्पना दत्त को बचपन से ही वीरतापूर्ण और साहसी कहानियाँ सुनने का शौक था। वे मशहूर क्रान्तिकारियों की जीवनी पढ़कर उनको अपना आदर्श मानती थीं। अपने खाली समय में व्यायाम करतीं और तैराकी सीखती थीं, ताकि बहादुरी का काम करने के लिए शरीर मज़बूत हो सके। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद आगे की पढाई के लिए उनका दाखिला बैथ्यून कॉलेज कोलकाता में हुआ। कोलकाता आकर उन्हें क्रान्तिकारियों के विषय में अधिक जानने सुनने को मिला। कॉलेज में वे छात्री संघ से जुड़ गयीं और क्रान्तिकारी गतिविधियों में शिरकत करने लगीं और कई छोटे बड़े कार्यों को अंजाम भी दिया। उस दौरान उनकी मुलाक़ात बीना दास और प्रीति वड्डेदार जैसी महिला क्रान्तिकारियों तथा स्वतन्त्रता सेनानी सूर्यसेन (मास्टर दा) से हुई। जिसके बाद वे उनके संगठन "इंडियन रिपब्लिकन आर्मी" में शामिल हो गयीं और अँग्रेजों के खिलाफ़ मुहिम का हिस्सा बन गयीं तथा अँग्रेजी सरकार को भारत से मिटाने के लिए क्रान्तिकारी गतिविधियों का मार्ग अपनाकर कूद पड़ींं देश को आज़ाद कराने। वे लड़कों के वेश में क्रान्तिकारियों के पास गुप्त रूप से गोला बारूद सप्लाई करतीं और हथियार पहुँचाने का काम करती थींं। अप्रैल 1930 में जवाहरलाल नेहरू जी की गिरफ्तारी पर कल्पना दत्त ने कॉलेज में हड़ताल करवा दी थी। उन्हीं दिनों 18अप्रैल 1930 को क्रान्तिकारियों ने चटगाँव के शस्त्रागार पर भी हमला कर उसे लूटा और अपने कब्ज़े में ले लिया। अचानक हुए हमले से अँग्रेज बौखला गए और चटगाँव के चप्पे चप्पे पर पुलिस बिठा दी गयी। बहुत मुश्किल से कल्पना दत्त कोलकाता से अपने गाँव चटगाँव आ गयी। उसी दौरान संगठन के कई क्रान्तिकारी गिरफ्तार हो गए।
 कल्पना ने संगठन के लोगों को आज़ाद कराने के लिए अदालत के भवन और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई तथा चटगाँव यूरोपियन क्लब पर हमले का फैसला किया। योजना को अंजाम देने के लिए कल्पना अपना हुलिया बदला पुरूष वेश में हो गयी। किसी सूत्र से पुलिस को ख़बर मिल गयी और उनकी योजना सफल नहीं हो पायी। कल्पना दत्त गिरफ्तार कर ली गयीं परन्तु अभियोग सिद्ध नहीं होने के कारण कल्पना को रिहा कर दिया गया लेकिन पुलिस की निगरानी बढा दी गयी थी। कल्पना पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रही और सूर्यसेन के साथ मिलकर दो साल तक भूमिगत होकर आन्दोलन चलाती रहीं। बाद में सूर्यसेन को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके साथियों के साथ उन्हें फाँसी की सज़ा सुनायी गयी और कल्पना दत्त को उम्र कैद की सज़ा हुई। महात्मा गाँधी जी खुद कल्पना से मिलने जेल में गए और रिहाई के लिए प्रयास करने को कहा था। आज़ादी मिलने से पहले महात्मा गाँधी जी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रान्तिकारियों को जेल से छुड़ाने की मुहिम चलाई जिसमें अँग्रेजों को बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों को भी छोड़ना पड़ा। उन्हीं क्रान्तिकारियों में कल्पना दत्त भी थीं। सन् 1939 में वे जेल से रिहा हुईं और अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की। पढाई के साथ साथ कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ गयीं। कम्यूनिस्ट पार्टी में भाग लेते समय ही कल्पना की भेंट कम्यूनिस्ट नेता पूरन चन्द जोशी (पी.सी. जोशी) से हुईं। वे उनसे अत्यधिक प्रभावित हुईं और 04 अगस्त 1943 को वे दोनों विवाह बन्धन में बँध गए।
कल्पना दत्त ने अपने पति के साथ बंगाल अकाल के दौरान पीड़ितों की मदद के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। आज़ादी के बाद उन्होंने अपने स्तर पर लोगों के लिए काम करना जारी रखा। वह बंगाल से दिल्ली आ गयीं। वहाँ "इंडो सोवियत सांस्कृतिक सोसाइटी" की भी हिस्सा बनी थीं। वर्ष 1975 में राजधानी में उनका सम्मान किया गया था। भारत सरकार द्वारा स्वतन्त्रता सेनानियों को मिलने वाली पेंशन राशि बढाकर दोगुनी कर दी गयी थी। वर्ष 1979 को उनकी वीरता और निडरता को देखते हुए उन्हें "वीर महिला" की उपाधि से नवाज़ा गया था। 08 फरवरी 1995 को उनका निधन हो गया।
अँग्रेजों से बड़ी निडरता और साहस के साथ लड़ने वाली देश की आज़ादी के लिए खुद को समर्पित कर देने वाली वीर क्रान्तिकारी महिला की देशभक्ति और वीरता को आइए हम सलाम करें! प्रेरणा लें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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