देश की पहली महिला मुख्यमंत्री महान स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी - जयंती पर विशेष : आजादी का अमृत महोत्सव

 

                !! देश की आजादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज मैं बात कर रही हूँ "आज़ाद भारत" की एवम् "उत्तर प्रदेश" की "पहली महिला मुख्यमंत्री" सुचेता कृपलानी की। जिन्हें देश की आज़ादी के समय 14 -15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का संविधान सभा में दिया गया "Tryst with Destiny" ऐतिहासिक भाषण जो बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ भाषणों में शुमार किया जाता है। उनके उसी ऐतिहासिक भाषण के बिल्कुल पहले "वन्दे मातरम", "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" और "जन-गण-मन" राष्ट्र - गान गाने के लिए आमन्त्रित किया गया था। जिन्होंने संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी तथा भारत के संविधान में महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी। सन् 1946 में वह ध्वज प्रस्तुति समिति की सदस्य भी थींं। जिसने संविधान सभा के समक्ष पहला भारतीय ध्वज प्रस्तुत किया था। उन्हीं महान प्रतिष्ठित स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की जयन्ती पर आज हम उन्हें याद करते हुए सादर शत शत नमन करते हैं। मज़बूत इच्छाशक्ति और जुझारूपन की मिशाल महान स्वतन्त्रता सेनानी हैं - "सुचेता कृपलानी" 

                             प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

53 - सुचेता कृपलानी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की बागडोर सँभालने वाली देश की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। तथा भारत की पहली मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त करने वाली भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गाँधी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली थीं! वह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की समर्थक थीं! वह भारत की उन 15 महिलाओं में शामिल थीं जिन्हें संविधान सभा की सदस्य के रूप में चुना गया था जिन्हें मिलकर भारत के संविधान की रचना करनी थी वही संविधान जिसकी नींव पर आज हमारा गणतन्त्र राज्य खड़ा है! स्वतन्त्रता संग्राम में वह उस समय जुड़ीं जब वह संग्राम चरम पर था वहीं से उनके जीवन में भारतीय राजनीति की नींव पड़ी थी जो आगे चलकर मज़बूत होती चली गयी। सुचेता कृपलानी जी वर्तमान संतकबीरनगर (तत्कालीन बस्ती जिला) जिले की मेहदावल विधानसभा सीट से विधायक चुने जाने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं। 

सुचेता कृपलानी का जन्म - हरियाणा के अम्बाला शहर में 25 जून 1908 को एक बंगाली ब्राम्हण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम एस.एन. मजूमदार था।  ब्रिटिश शासन में एक सरकारी चिकित्सक के रूप में देश की सेवा की। वेे एक उत्साही देशभक्त थे। उन्होंने खुद को राष्ट्र की सेवा और देेश की स्वतन्त्रता के लिए समर्पित कर दिया था। वे राष्ट्रवादी व्यक्ति थेे। उन्होंने ही सुचेता कृपलानी के मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना जगायी थी। बचपन से ही सुचेता कृपलानी के मन में जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद से अँग्रेजों के लिए गुस्सा था। जो साथ खेल रहे एंग्लो इंडियन बच्चों के ऊपर वे निकालती थीं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पिता की सरकारी नौकरी में हर तीन वर्षों में तबादले के कारण कई स्कूलों में हुई थी। आगे की पढाई के लिए उन्हें दिल्ली भेज दिया गया। जहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ और सेंट स्टीफेंस कॉलेज से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उन्होंने इतिहास में एम.ए की डिग्री हासिल की थी। कॉलेज से निकलने के बाद 21 वर्ष  की उम्र में ही वे स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूदना चाहती थीं। लेकिन उन्हीं दिनों साल 1929 में उनके पिता और बहन की मृत्यु हो गयी और परिवार की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गयी थी। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संवैधानिक इतिहास की प्रोफेसर के पद पर नौकरी कर ली। वे अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के साथ साथ स्वतन्त्रता संग्राम के महत्व को भी समझाया करती थीं। विश्वविद्यालय में नौकरी के दौरान ही उनकी मुलाकात उसी विश्वविद्यालय में रहे इतिहास के पूर्व प्रोफेसर तथा स्वतन्त्रता आन्दोलन के जाने माने गाँधीवादी नेता जीवतम भगवानदास आचार्य कृपलानी (जे.बी. कृपलानी) से हुई थी। जो असहयोग आन्दोलन के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी त्याग दिए थे। उस वक्त विश्वविद्यालय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सैनिकों का गढ़ था और आचार्य कृपलानी अक्सर वहाँ स्वयंसैनिकों को ढूँढने विश्वविद्यालय में आया करते थेे। सन् 1934 में बिहार में आए भूकम्प के दौरान राहत शिविरों में भाग लेते वक्त आचार्य कृपलानी और सुचेता कृपलानी में निकटता बढ़ी जो प्यार का रूप लेकर शादी तक बात आ पहुँची थी। सुचेता कृपलानी ने जब परिवारवालों को स्वयं से 20 साल बड़े आचार्य कृपलानी से शादी करने का फैसला सुनाया तो उन्हें परिवारवालों के साथ साथ महात्मा गाँधी जी के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। क्योंकि आचार्य कृपलानी उम्र में काफी बड़े होने के साथ ही महात्मा गाँधी जी के बाद शीर्ष नेताओं में थे और महात्मा गाँधी जी के दाहिने हाथ भी थे और गाँधी जी को उसी बात का डर था कि शादी के बाद उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन से पीछे न हटना पड़े। लेकिन सुचेता कृपलानी का मानना था कि शादी के बाद महात्मा गाँधी जी को स्वतन्त्रता संग्राम के लिए दो कार्यकर्ता मिल जायेंगे और आखिरकार वे साल 1936 में परिवारवालों और महात्मा गाँधी जी के कड़े विरोध के बावजूद शादी के बंधन में बँध गयेे।
 विवाह के बाद सुचेता कृपलानी अपने पति आचार्य कृपलानी का साथ पाकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में पूरी तरह से कूद पड़ीं और स्वतन्त्रता की लड़ाई में पूरी तरह से सक्रिय हो गयीं। 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वे प्रथम मोर्चे पर खड़ी थीं। जब सारे नेता जेल चले गए तो अपनी बुद्धिमता का परिचय देते हुए उन्होंने मन में विचार किया कि यदि सभी नेता जेल चले जायेंगे तो आन्दोलन को आगे कौन बढ़ायेगा और अलग रास्ते पर चलने का निर्णय लेकर वे भूमिगत हो गयीं। उन्होंने "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" की "महिला शाखा" की स्थापना की और पुलिस से छुपते छुपाते दो साल तक आन्दोलन भी चलाया। उसके लिए अंडरग्राउन्ड वालन्टियर फोर्स बनायी। लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा और संकट से घिर जाने पर आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी थीं। राजनीतिक कैदियों के परिवार को राहत देने का जिम्मा लिया और देश की आज़ादी के लिए आवाज़ भी उठाती रहीं। सन् 1942 में उन्होंने स्वयं को पुलिस गिरफ्तारी से बचा लिया, लेकिन 1944 में गिरफ्तार कर ली गयीं और उन्हें एक साल जेल की सज़ा हो गयी।
सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान भी वे महात्मा गाँधी जी की बेहद करीबी सहयोगी थीं। आज़ादी मिली तो संविधान सभा में 14 -15अगस्त 1947 की मध्यरात्रि पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के ऐतिहासिक भाषण के पूर्व "वन्दे मातरम" भी उन्होंने ही गाया था। भारत विभाजन हुआ तो बँटवारे के दौरान दंगों में जहाँ सबसे अधिक खून बहा था, नोआखली (पूर्व बंगाल) के दंगापीड़ित इलाकों में महात्मा गाँधी जी के साथ चलते हुए उन्होंने पीड़ित लोगों व महिलाओं की मदद की थी। उसी जगह सुचेता कृपलानी को महात्मा गाँधी जी से एक महत्वपूर्ण सीख मिली थी। महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि - "उनका (शरणार्थियों का) आत्म-सम्मान मत छीनना, उनको भिखारी नहीं बनाना है। दूसरे शब्दों में शरणार्थियों को काम के बदले मदद देना था।" अलग क्षेत्रों में कार्य करते हुए भी उन्होंने महात्मा गाँधी जी से सीखा था कि "लोगों का ऊपर से मदद करना ही काफी नहीं है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम लोगों को खुद की मदद करने की ताकत दे पायें।" 
वर्ष 1949 में सुचेता कृपलानी को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय प्रतिनिधि मंडल की सदस्य के रूप में चुना गया था। सन् 1952 में वे अपने पति द्वारा स्थापित की गयी "किसान मज़दूर पार्टी" की ओर से नई दिल्ली से चुनाव लड़ीं और जीतीं भी। परन्तु शीघ्र ही राजनैतिक मतभेदों के कारण वह काँग्रेस में लौट आयीं। 1957 में काँग्रेस के टिकट पर उसी सीट से वह दुबारा चुनाव जीतीं और राज्य मंत्री बनी थीं। 1958 से 1960 तक वह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की महासचिव थीं। सन् 1962 में वे उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव लड़ीं और कानपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनी गयीं और उन्हें श्रम सामुदायिक विकास और उद्योग विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया तथा 1963 में उन्हें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बना दिया गया। 1963 से 1967 तक वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। वर्ष 1967 में उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से चौथी बार लोकसभा चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। साल 1971 में उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और अपने पति के साथ दिल्ली में बस गयीं। नि:संतान होने के कारण उन्होंने अपना सारा धन और संसाधन लोक कल्याण समिति को दान कर दिया था। उन्हीं दिनों उन्होंने अपनी आत्मकथा - "एन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी" लिखनी शुरू की थी जो तीन भागों में प्रकाशित हुई थी। जिसमें 1947 तक उनके जीवन का वर्णन है। धीरे धीरे उनका स्वास्थ्य गिरता गया और 01 दिसम्बर 1974 को हृदय गति रूक जाने से उनका निधन हो गया।
 सुचेता कृपलानी जी ने भारत व उत्तर प्रदेश की पहली मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया था। वे बँटवारे की त्रासदी में महात्मा गाँधी जी के बेहद करीबी सहयोगी रही थीं। वे उन चन्द महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने बापू के करीब रहकर देश की आज़ादी की नींव रखी थी। नोआखली यात्रा में भी वे महात्मा गाँधी जी के साथ थीं। वे दिल की कोमल थीं, लेकिन प्रशासनिक फैसले लेते समय वे दिल की नहीं दिमाग की सुनती थीं। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य कर्मचारियों ने लगातार 62 दिनों तक हड़ताल जारी रखी थी तो वे कर्मचारी नेताओं से सुलह को तभी तैयार हुई थीं जब उनके रूख में नरमी आयी थी। वे कस्तूरबा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट की संगठन सचिव और गाँधी स्मारक निधि की उप सभापति थीं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय की सीनेट तथा मीरेण्डा हाउस व लेडी श्रीराम कॉलेज की गवर्निंग कौंसिल की सदस्य तथा नव हिन्द एजूकेशन सोसाइटी की अध्यक्ष भी थीं।
सुचेता कृपलानी का स्वतन्त्रता सेनानी के साथ साथ एक सफल राजनीतिक जीवन भी था। आज उन्हीं की जयन्ती है। हमारी पथ प्रदर्शक प्रेरणाश्रोत हमारे उत्तर प्रदेश की और हमारे भारत देश की पहली महिला मुख्यमंत्री और महान स्वतन्त्रता सेनानी की जन्म जयन्ती है। 
आइये हम उन्हें याद करें, प्रणाम करें, श्रद्धा सुमन अर्पित कर श्रद्धान्जलि अर्पित करें! सादर नमन! आदरपूर्ण सादर श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय! 

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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