महान स्वतंत्रता सेनानी जानकी देवी बजाज ने अछूतों के लिए खुलवाया था मंदिर : आजादी का अमृत महोत्सव

                !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी काअमृत महोत्सव" में आज मैं एक ऐसी महान महिला स्वतन्त्रता सेनानी की बात कर रही हूँ जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ साथ महिला शिक्षा व उनके सामाजिक उत्थान और हरिजनों के जीवन की बेहतरी के लिए उनके मंदिर में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण काम किया था। पहली बार 17 जुलाई 1928 के ऐतिहासिक दिन को अपने पति और हरिजनों के साथ वर्धा में बजाज परिवार द्वारा श्री लक्ष्मीनारायण का एक बड़ा मंदिर बनवाया गया था। उस मंदिर के दरवाजे को हरिजनों के लिए (हर किसी के लिए) खोलवाने का महत्वपूर्ण काम किया था। उस जमाने में अछूतों को स्वतन्त्र रूप से स्वीकार करने वाला यह देश का पहला मंदिर था।         

                     प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

37 - जानकी देवी बजाज "पद्म विभूषण" से सम्मानित देश की महिला स्वतन्त्रता सेनानी हैँ  "जानकी देवी बजाज" महाराष्ट्र के वर्धा के बेहद सम्पन्न घराने की बहू प्रसिद्ध उद्योगपति गाँधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी जमनालाल बजाज की धर्मपत्नी थीं। जिन्होंने देश के लिए स्वेच्छा से अपने सारे स्वर्ण आभूषणों का त्याग कर दिया था और आजीवन कभी कोई स्वर्ण आभूषण नहीं पहना था। उनका जन्म - जरौरा (मध्य प्रदेश) के एक सम्पन्न वैष्णव मारवाड़ी परिवार में 7 जनवरी 1893 को हुआ था। पिता का नाम गिरधारीलाल जजोदिया और माता का नाम मैना देवी था। जो सादगी और कोमलता की प्रतिमूर्ति थीं। जानकी देवी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। मात्र वर्ष  की आयु में ही उनकी शादी वर्धा महाराष्ट्र के बेहद धनी सम्पन्न बजाज घराने के 12 वर्षीय जमनालाल बजाज से हुई थी। विवाह के बाद 1902 में वे पति जमनालाल बजाज के साथ जरौरा से वर्धा आ गयीं और उनके छोटे कन्धों पर घर गृहस्थी की जिम्मेदारी डाल दी गयी। उनके पाँच बच्चे हुए जिनके पालन पोषण और घर के कामों में वो लीन रहती थी। उनके पति जमनालाल जी महात्मा गाँधी जी से प्रभावित होकर सादगी को अपने जीवन में उतार लिया था। वह भी महात्मा गाँधी जी और अपने पति से बेहद प्रभावित थीं।

उनके पति जमनालाल बजाज मानते थे कि सोना "कलि" का प्रतीक हैै। यह ईर्ष्या और खोने के डर को जन्म देता है। गाँधीवादी विचारों वाले स्वतन्त्रता सेनानी जमनालाल बजाज जी एक सामाजिक कार्यकर्ता और दानी भी थे। गाँवों की सेवा, स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने और महिलाओं के उत्थान आदि के क्षेत्र में उनके द्वारा किये जा रहे रचनात्मक कार्यों से प्रभावित होकर जानकी देवी बजाज भी अपने पति की सादगी को अपने जीवन में उतार लिया। स्वेच्छा से अपने पति के नक्शेकदम पर चलीं और त्याग के रास्ते को अपना लिया। इसकी शुरूआत स्वर्ण आभूषणों के दान के साथ हुई। पति के कहने पर सामाजिक वैभव और कुलीनता के प्रतीक बन चुके पर्दा प्रथा का उन्होंने त्याग किया और घर की चाहरदीवारी से बाहर निकलकर महिलाओं को भी पर्दा प्रथा त्यागने के लिए प्रोत्साहित किया तथा महात्मा गाँधी जी के जन-संदेश को हजारों लोगों के दिलों तक पहुँचाईं। वह लोगों के बीच जब स्वराज का भाषण देती थीं तो लोग मंन्त्रमुग्ध होकर उनकी बातें सुनते थेे। साल 1919 में उनके इस कदम से प्रेरित होकर हजारों महिलायें जो कभी घर से बाहर नहीं निकली थीं, आज़ाद महसूस कर रही थीं। वो ग्रामीण भारत के इलाकों में भी उन तमाम लोगों को जागरूक करने में लगी थीं जो स्वतन्त्रता के ख्वाब देखते थे। अपने पति से प्रेरित होकर 28 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने सिल्क के वस्त्रों का त्याग किया और गहने पहनने की प्रथा को भी छोड़ दिया था। जानकी देवी बजाज गाँधीवादी जीवनशैली की कट्टर समर्थक थीं। वह स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने के दौरान 1921 में महात्मा गाँधी जी से प्रभावित और प्रेरित होकर घर के अन्दर और बाहर इस्तेमाल होने वाले विदेशी कपड़ों व सामानों की होली जलायी थी और स्वदेशी खादी वस्त्र अपनाया। वो अपने हाथों से सूत काततीं तथा घर घर जाकर महिलाओं को भी चर्खा चलाना सूत कताई करना सिखाती थीं। उन्होंने "स्वदेशी आन्दोलन" में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। स्वदेशी अवधारणा को अपनाने के अलावा धार्मिक स्थलों पर हरिजनों को मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति के लिए निरन्तर प्रयास कर सफलता पायी।
महिलाओं की शिक्षा को बढावा दिया उनके सामाजिक उत्थान और हरिजनों की जीवन शैली में सुधार के क्षेत्र में सराहनीय योगदान किया। उनका परिवार धनी और समान रूप से उदार था। हर वर्ग जाति और धर्म के लोग इससे लाभान्वित हुए। उन्होंने अपने घर में खाना बनाने के लिए एक दलित महाराजिन को रखा और उसे खाना बनाना सिखाया। आचार्य विनोबा भावे बजाज परिवार के आध्यात्मिक गुरू थे। उनके नेतृत्व में वर्धा में बजाज परिवार द्वारा श्री लक्ष्मीनारायण जी का एक बहुत बड़ा मंदिर बनवाया गया था। महात्मा गाँधी जी से प्रेरित होकर 17 जुलाई 1928 को जानकी देवी बजाज और उनके पति जमनालाल बजाज जी ने इस मंदिर को हरिजनों के लिए भी खोल दिया था। जानकी देवी ने इस कार्यक्रम के प्रति पूरी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की थी। इस प्रकार अछूतों को स्वतन्त्र रूप से स्वीकार करने वाला यह देश का पहला मंदिर था। आज भी इस मंदिर में भगवान की मूर्तियों को खादी वस्त्र पहनाया जाता है। देवता पर कोई सोने या कीमती पत्थरों के आभूषण नहीं सजाए जाते हैं और प्रसाद केवल गाय के दूध से ही बनाया जाता है। सभी धर्म, जाति, वर्ग के लोग एक ही भक्ति के साथ मंदिर में आशीर्वाद के लिए जाते हैं। अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी ये जंग लोगों के लिए एक नया सबक थी। उन दिनों हरिजनों को अछूत माना जाता था। स्पर्श की बात तो छोड़िये उनकी परछाईं भी अपवित्र मानी जाती थी। गाँधीवादी जीवनशैली की कट्टर समर्थक जानकी देवी बजाज ने कुटीर उद्योग के माध्यम से ग्रामीण विकास में काफी सहयोग किया। वह एक स्वावलम्बी महिला थीं। वह अपने पति की तरह दान करने में आगे रहती थीं। वे मितव्ययी व कठोर थीं लेकिन दयालु थीं। वह 1930 में जब महात्मा गाँधी जी ने नमक सत्याग्रह किया तब उन्होंने अपने बड़े पुत्र कमलनयन को मात्र 15 वर्ष की अल्पायु में आन्दोलन में भाग लेने के लिए भेज दिया था और खुद भी हिस्सा लीं। उन्होंने अपने पति व महात्मा गाँधी जी की विचारधारा को पूरी तरह से अपने जीवन में उतार लिया था।
जानकी देवी बजाज को 1932 में सविनय अवग्या आन्दोलन में भाग लेने पर अँग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और जेल में डाल दिया था। उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम, महिलाओं के उत्थान के साथ गौ सेवा और हरिजनों के जीवन की बेहतरी और उनके मंदिर में प्रवेश के लिए बहुत काम किया। आज़ादी के बाद वे आचार्य विनोबा भावे जी के साथ कूपदान, ग्राम सेवा, गौ सेवा और भूदान जैसे आन्दोलनों से जुड़ी रहीं। गौ सेवा के प्रति उनके जुनून के चलते वो 1942 से कई सालों तक "अखिल भारतीय गौ सेवा संघ" की अध्यक्ष रहीं। जानकी देवी बजाज के आजीवन किये गए कार्यों को सम्मानित करने वाली भारत सरकार द्वारा वर्ष 1956 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "पद्म विभूषण" से सम्मानित किया गया। 1965 में जानकी देवी बजाज की आत्मकथा "मेरी जीवन यात्रा" प्रकाशित हुई। साल 1979 में 86 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी स्मृति में कई शैक्षणिक संस्थान और पुरस्कार स्थापित किये गए हैं। जिनमें - "जानकी देवी बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट स्टडीज" और बजाज द्वारा स्थापित "जानकी देवी बजाज ग्राम विकास संस्थान" शामिल हैं। सन् 1992 - 93 में भारतीय व्यापारियों की महिला विंग ने ग्रामीण उद्यमियों के लिए "महिला विंग जानकी देवी बजाज पुरस्कार" की स्थापना की है।

आइये देश के लिए अपने सुखों का त्याग करने वाली कर्मठ दयालु व दानी "पद्म विभूषण" से सम्मानित जानकी देवी बजाज जी को हम प्रणाम करें! उनसे प्रेरित हों! सादर कोटि कोटि नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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