आजादी की दीवानी डॉ. ऊषा मेहता : आजादी का अमृत महोत्सव

            !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज हैं - महान स्वतन्त्रता सेनानी "भारत की पहली रेडियो वूमेन" "डॉ. उषा मेहता" - भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान "खुफिया रेडियो स्टेशन" सेवा प्रसारण शुरू करने वाली उषा मेहता जी का जन्म - गुजरात में सूरत के पास "सरस" नामक एक छोटे से गाँव में 25 मार्च 1920 को हुआ था।

                                    प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

25 - उषा मेहता - ये जब मात्र पाँच वर्ष की थीं तब पहली बार अहमदाबाद आश्रम की यात्रा के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी को देखा था। कुछ समय बाद अपने गाँव के पास ही लगे महात्मा गाँधी जी के शिविर सत्रों में भाग लिया। थोड़ी कताई भी की थी, और बापू को समझने का अवसर प्राप्त हुआ था। उसी समय उषा मेहता ने खादी पहनने और स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने का प्रण कर लिया था। साल 1928 में मात्र आठ वर्ष की उम्र में साइमन कमीशन के खिलाफ एक विरोध मार्च में अन्य बच्चों के साथ भाग लिया और अपना पहला शब्द "साइमन गो बैक" चिल्लाकर ब्रिटिश राज के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था और शराब की दूकानों के सामने धरना दिया। इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों ने बच्चों पर आरोप लगाया और भारतीय ध्वज ले जाने वाली एक लड़की ध्वज के साथ नीचे गिर गयी। बच्चे लड़की को लेकर उसके माता पिता के पास गये। इस घटना से गुस्साये बड़ों ने कुछ दिन बाद बच्चों को भारतीय ध्वज (केसरिया, सफेद और हरा) के रंगों में कपड़े पहनाकर सड़कों पर भेजकर जवाब दिया था। झण्डे के रंगों में सजकर बच्चों ने फिर से मार्च किया और चिल्लाते हुये कहा - पुलिसकर्मियों आप अपनी लाठी और डण्डों को सँभाल सकते हैं, हमारे झण्डे को नीचे नहीं ला सकते। डॉ. उषा मेहता के पिता ब्रिटिश राज में न्यायाधीश (जज) के पद पर कार्यरत थे। इसलिए किसी भी आन्दोलन में भाग लेने के लिये बेटी को प्रोत्साहित नहीं करते थे। 1930 में पिता सेवानिवृत्त हो गये तो परिवार के साथ बॉम्बे शिफ्ट हो गये। सन् 1932 में उषा मेहता 12 वर्ष की थीं, तो बॉम्बे में स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गयीं। उन्होंने मुम्बई विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र से स्नातक की डिग्री लेने के बाद कानून की पढाई की तैयारी करने लगीं। तभी 1942 में महात्मा गाँधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की घोषणा की। उसी समय उषा मेहता ने पढ़ाई बन्द करने और स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन में शामिल होने का फैसला कर लिया था।

आज़ादी हासिल करने के लिए महात्मा गाँधी जी के अहिंसा के रास्ते से बहुत प्रभावित हुई और बापू के बताये रास्ते पर चलकर भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में पूरी तरह से खुद को समर्पित कर दिया। 1942 में अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी के एक सत्र में उषा मेहता को महात्मा गाँधी, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद और सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा दिये गये भाषणों की जानकारी थी। इन भाषणों ने ही उन्हें एक रेडियो स्टेशन बनाने और दुनिया तक समाचार को पहुँचाने के लिये प्रेरित किया था। उन्हें पूरा विश्वास था कि अपने देश की घटनाओं को दुनिया के लोगों तक पहुँचाने के लिये रेडियो काफी मददगार साबित होगा। उनका मानना था कि रेडियो उनको उनकी बात रखने का अवसर देगा। नौ अगस्त 1942 को बॉम्बे गोवालिया टैंक मैदान से भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत हुई। महात्मा गाँधी जी के साथ काँग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये।
उषा मेहता समेत काँग्रेस के कुछ छोटे नेता गिरफ्तार होने से बच गये थे। ये लोग गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराकर बापू के भारत छोड़ो आन्दोलन की आवाज़ बने रहे। लेकिन बड़े नेताओं की ग़ैरमौजूदगी में उनकी आवाज़ कहाँ तक सुनी जाती तब आइडिया आया। नौ अगस्त 1942 की शाम काँग्रेस के कुछ युवा समर्थकों ने बॉम्बे में बैठक की। इन लोगों का विचार था कि भारत छोड़ो आन्दोलन की आग मद्धिम नहीं पड़नी चाहिये। इसके लिये कुछ कदम उठाने ज़रूरी थे। इन लोगों का मानना था कि अख़बार निकालकर अपनी बात लोगों तक नहीं पहुँचा पायेंगे। क्योंकि ब्रिटिश सरकार के दमन के आगे अख़बार की पहुँच सीमित होगी। इस बैठक में रेडियो की समझ रखने वाले उषा मेहता जी जैसे कुछ युवा भी थे, और संचार के नये साधन रेडियो के इस्तेमाल के जरिये क्रान्ति की अलख जगाने की बात कही। 
14अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने सहयोगियों के साथ काँग्रेस खुफ़िया रेडियो सर्विस स्टेशन की पहली घोषणा की। अँग्रेजों के खिलाफ "खुफिया रेडियो स्टेशन" शुरू करने वालों में उषा मेहता जी के साथ बाबू भाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी और नरीमन अबराबाद प्रिंटर थे। प्रिंटर इंग्लैण्ड से रेडियो की टेक्नालॉजी सीखकर आये थे। उषा मेहता को उस "खुफ़िया रेडियो सर्विस" की एनाउंसर बनाया गया। पुराने ट्रांसमीटर को जोड़ तोड़कर इस्तेमाल में लाये जाने लायक बनाया गया और इस तरह से अँग्रेजों के खिलाफ सीक्रेट रेडियो सर्विस (काँग्रेस रेडियो) की शुरूआत हुई। उषा मेहता अपने साथियों के साथ मिलकर एक खुफ़िया ठिकाने पर "कांग्रेस खुफिया रेडियो" की स्थापना की। पहले प्रसारण में उषा मेहता ने धीमी आवाज़ में रेडियो प्रसारण में घोषणा की- "ये कांग्रेस रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है।" उस वक़्त उषा मेहता के साथ बाबू भाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी, चन्द्रकान्त झवेरी और मनका मोटवानी थे। मनका मोटावानी शिकागो रेडियो के मालिक थे। उन्होंने ही रेडियो ट्रांसमिशन का कामचलाऊ उपकरण और टेक्निशियन उपलब्ध कराये थे। कई काँग्रेसी नेता भी जुड़े थे। आज़ादी के आन्दोलन को आवाज़ देने के लिए काँग्रेस रेडियो शुरू हो चुका था। काँग्रेस रेडियो के साथ युवा काँग्रेसियों के नेताओं के साथ डॉ. राम मनोहर लोहिया, अच्युतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम जैसे सीनियर नेता भी जुड़ चुके थे। कांग्रेस रेडियो के जरिये महात्मा गाँधी और काँग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं के भाषण प्रसारित किये जाते थे।
ब्रिटिश अधिकारियों की कड़ी निगरानी के बावजूद भी उन्होंने रेडियो के जरिये ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीय लोगों पर किये गये अत्याचारों की सूचना देना ज़ारी रखा। हालांकि सीक्रेट रेडियो सिर्फ तीन महीने ही चला, लेकिन इस रेडियो सेवा ने आज़ादी के आन्दोलन में तेजी ला दी। जो सूचनायें ब्रिटिश सरकार आम जनता से छुपाना चाहती थी रेडियो के ज़रिये उसका प्रसारण किया जाता था। काँग्रेस रेडियो के ज़रिये बड़े बड़े नेता जनता तक अपनी आवाज़ पहुँचाते। एक टेक्निशियन की गद्दारी की वजह से सिर्फ तीन महीनों में ही काँग्रेस सीक्रेट रेडियो स्टेशन बन्द हो गया। ब्रिटिश हुकूमत की नजरों से बचने के लिये इस खुफ़िया रेडियो सेवा के स्टेशन करीब करीब रोज बदले जाते थे। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उन लोगों ने 7 - 8 बार रेडियो स्टेशन बदला था। 12 नवम्बर 1942को जब उषा मेहता जी गिरगाँव से एक शो होस्ट कर रही थीं, तब पुलिस ने उन्हें और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया। तमाम कोशिशों के बाद भी रेडियो सेवा अधिक दिनों तक नहीं चलाया जा सका। अँग्रेजों के सीआईडी विभाग ने 6 माह तक खुफिया रेडियो सेवा चलाने के मामले की जाँच की और उषा मेहता समेत उनके सभी साथियों को जेल में डाल दिया गया। हाईकोर्ट में इस मामले का मुकदमा चला और चार साल की कैद की सज़ा सुनायी गयी। साल 1946 में उषा मेहता को जेल से रिहा किया गया। जेल में उषा मेहता को ब्रिटिश सरकार ने अपने अन्य साथियों के बारे में जानकारी देने के बदले विदेश में पढने का उन्हें प्रस्ताव दिया इन सबके बावजूद उन्होंने अपने साथियों से जुड़ी किसी भी जानकारी का खुलासा नहीं किया। उसके बाद वे बॉम्बे विश्वविद्यालय से गाँधीवादी विचार पर पीएचडी की और मुम्बई विश्वविद्यालय में ही अध्यापन शुरू किया। बाद में वे नागरिक शास्त्र एवम् राजनीति विभाग की प्रमुख बनीं इसके साथ ही विभिन्न गाँधीवादी संस्थाओं से जुड़ी रहीं। "गाँधी पीस फाउंडेशन" की "अध्यक्ष" भी रहीं। आज़ादी के बाद भी डॉ. उषा मेहता गाँधीवादी विचारों को आगे बढाने के लिये विशेषकर महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों में काफी सक्रिय रहीं। वह "गाँधी शांति प्रतिष्ठान" की भी सदस्य थीं। सन् 1998 में भारत सरकार द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "पद्म विभूषण" से सम्मानित किया गया। 11अगस्त 2000 को इस महान स्वतन्त्रता सेनानी डॉ. उषा मेहता ने अपनी ज़िन्दगी की आखिरी साँस ली उनका निधन हो गया। देश की आज़ादी की लड़ाई में उनका जोश और उत्साह कम नहीं हुआ। देश की आजादी में डॉ. उषा मेहता जी का महत्वपूर्ण योगदान है।

आइये हम अपनी महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और भारत की पहली "रेडियो वूमेन" के नाम से विख़्यात डॉ. उषा मेहता जी को याद करते हुये उन्हें प्रणाम करें! उनसे प्रेरणा लें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धांजलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम्! भारत माता जी की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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