जानिए साहसी दिलेर स्वतंत्रता सेनानी अक्कम्मा चेरियन को : आजादी का अमृत महोत्सव

 

                 !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" "मैं नेता हूँ, दूसरों को मारने से पहले मुझे गोली मारो" इन शब्दों को जिस निडरता, जुनून और धैर्य के साथ जिन्होंने कहा था जिनके अदम्य साहस के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने "त्रावणकोर की झाँसी की रानी" की उपाधि दी थी। वह साहसी बहादुर महान स्वतन्त्रता सेनानी हैं - "अक्कम्मा चेरियन" 

                                             प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

33 - अक्कम्मा चेरियन महान क्रान्तिकारी वीरांगना अक्कम्मा चेरियन का जन्म- कांजीरापल्ली त्रावणकोर (वर्तमान केरल) के एक छोटे से गाँव में 14फरवरी 1909 को हुआ था। माता का नाम- अन्नाम्मा और पिता का नाम- थॉममन चैरियन था। अक्कम्मा चैरियन एक साहसी, दिलेर और प्रतिभाशाली महिला स्वतन्त्रता सेनानी थीं। "मैं नेता हूँ - दूसरों को मारने से पहले मुझे गोली मारो" इन साहस भरे शब्दों को अकम्मा चेरियन ने तब कहा था जब 1938 में कर्नल वॉटसन के सामने इतनी निडरता जुनून और धैर्य के साथ खड़ी हुई थीं कि उसे अपना आदेश वापस लेने के लिए मज़बूर होना पड़ा था और एक बड़ा नरसंहार टल गया था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सरकारी गर्ल्स हाईस्कूल कांजिरापल्ली और सेंट जोसेफ हाईस्कूल चांगनाशेरी से हुई थी। सेंट टेरेसा कॉलेज, एनीकुलम से इतिहास में स्नातक की डिग्री अर्जित किया।

अक्कम्मा चेरियन ने 1931में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद सेंट मैेरी अँग्रेज़ी माध्यम विद्यालय, एडककारा में एक शिक्षक के रूप में कार्य किया। जहाँ बाद में वे स्कूल की प्रबन्धिका बन गयींं। उन्होंने इस संस्थान में लगभग 6 वर्षों तक कार्य किया और इस अवधि के दौरान उन्होंने ट्रि प्रशिक्षण कॉलेज से एल टी की उपाधि प्राप्त की। फरवरी 1938 में त्रावणकोर राज्य काँग्रेस का गठन हुआ और अक्कम्मा चैरियन ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन संघर्ष में शामिल होने के लिए अपने प्रतिष्ठित शिक्षण कार्य को छोड़ दिया था। पेशे से शिक्षिका होते हुये भी उनका असली सपना था अपने देश को आज़ाद देखना। वे जिस राज्य की रहने वाली थीं, उस राज्य में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व मुख्य रूप से त्रावणकोर राज्य काँग्रेस कर रही थी। त्रावणकोर राज्य काँग्रेस के नेतृत्व में त्रावणकोर के लोगों ने एक उत्तरदायी प्रशासन के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन करने का फैसला लिया। त्रावणकोर के दीवान सी.पी. अय्यर ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग करते हुये अगस्त 1938 में आन्दोलन को दबा दिया। इसने सविनय अवग्या आन्दोलन को जन्म दिया। 26 अगस्त 1938 को उन्होंने राज्य कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया, जो केरल में अपनी तरह का पहला आन्दोलन था। पट्टमताणु पिल्लै समेत पार्टी के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर सलाखों के बीच कैद कर लिया गया और आन्दोलन छिन्न भिन्न हो गया। ऐसा कहा जाता है कि तब राज्य काँग्रेस ने आन्दोलन की अपनी पद्धति को बदलने का फैसला किया और कार्यकारी समिति भंग कर दी गयी। इसके अध्यक्ष को एकात्मक शक्तियाँ प्रदान की गयी और उन्हें अपने उत्तराधिकारी को नामित करने का अधिकार भी दिया गया। राज्य काँग्रेस के ग्यारह अध्यक्षों को एक एक कर गिरफ्तार कर लिया गया। राज्य पार्टी के अध्यक्ष ने गिरफ्तारी के ठीक पहले अक्कम्मा चेरियन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया। क्योंकि उन्होंने पाया कि वे एक साहसी दिलेर और प्रतिभाशाली महिला थीं। अक्कम्मा चेरियन ने एक विशाल रैली का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य जेल में बन्द नेताओं को रिहा कराने और त्रावणकोर में एक जिम्मेदार सरकार स्थापित करने के लिए शासकों पर दबाव बनाना था। अक्कम्मा चेरियन उस समय मात्र 28 वर्ष की थीं। 
अपनी आत्मकथा जीवथम: ओरू समारम (लाइफ ए प्रोटेस्ट) में लिखती हैं - "मैं इस कार्य की गम्भीरता से अवगत थी और जानती थी कि इसके परिणाम क्या हो सकते हैं फिर भी मैंने स्वेच्छा से यह कार्य किया" ऐसा कहा जाता है कि बेहद साहसी और बहादुर अक्कम्मा चेरियन के नेतृत्व में हुये विरोध प्रदर्शन में 20,000 से अधिक लोग शामिल थे। देश भर में लोगों ने उनके अदम्य साहस की प्रशंसा की थी! महात्मा गाँधी जी ने भी उन्हें "त्रावणकोर की झाँसी की रानी" की उपाधि दी थी।
अक्टूबर 1938 में अक्कम्मा चेरियन को पार्टी द्वारा "देश सेविका संघ" (महिला स्वयंसेवी दल) के संगठित करने का काम सौंपा गया तो उन्होंने देश भर में अथक यात्रा की और महिलाओं को देश सेविका संघ में शामिल होने की अपील की। उनके अथक प्रयास से स्थानीय निकायों में महिला स्वयंसेविकाओं की वृद्धि हुई। 24 सितम्बर 1939 में उन्होंने त्रावणकोर राज्य काँग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में भाग लिया। जिसके लिये उन्हें एक साल के कारावास की सज़ा सुनायी गयी थी। जेल में उनके साथ मौखिक रूप से दुर्व्यवहार किया गया और तरह तरह से प्रताड़ित कर बहुत अधिक परेशान किया गया था। जेल से रिहा होने के बाद वे पार्टी की कार्यकर्ता से पार्टी की अध्यक्ष बन गयींं। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने 1942 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के बॉम्बे अधिवेशन में "भारत छोड़ो" प्रस्ताव का स्वागत किया। अक्कम्मा चेरियन को प्रतिबंध के आदेशों का उल्लंघन करने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए कई गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा। लेकिन वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुई। स्वतंत्रता के बाद वे 1947 में त्रावणकोर विधान सभा के लिए चुनी गयीं थींं। उन्होंने स्वतन्त्रता सेनानियों के पेंशन सलाहकार बोर्ड की सदस्य के रूप में भी कार्य किया था। अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने जीवन का सार प्रस्तुत करते हुये लिखा - "शेक्सपियर ने कहा है कि दुनिया एक मंच है और सभी पुरूष और महिलायें कलाकार हैं। लेकिन मेरे लिए यह जीवन एक लम्बा विरोध है - मेरा विरोध - रूढिवाद अर्थहीन कर्मकांड, सामाजिक अन्याय, लैंगिक भेदभाव और बेईमानी के विरुद्ध है या किसी भी चीज के विरुद्ध है जो कि अन्यायपूर्ण है। जब मैं ऐसा कुछ देखती हूँ तो मैं अंधी बन जाती हूँ। यहाँ तक कि मैं यह भी भूल जाती हूँ कि मैं किससे लड़ रही हूँ।" साल 1951 में उन्होंने एक स्वतंत्रता सेनानी और त्रावणकोर कोचीन विधान सभा के सदस्य वीवी वर्की मन्नमप्लक्कल से शादी की। उनका एक बेटा थाा - जिसका नाम जार्ज वी वर्की था, जो इन्जीनियर बना। 05 मई 1982 को अक्कम्मा चेरियन की मृत्यु हो गयी। त्रिरूवनंतपुरम के बेल्लयमबलम में उनकी स्मृति में एक मूर्ति बनायी गयी थी! अक्कम्मा चेरियन जी का सम्पूर्ण जीवन हम सभी के लिये प्रेरणादायी है। 
 आइये हम महान स्वतन्त्रता सेनानी साहसी और बहादुर त्रावणकोर की झाँसी की रानी "अक्कम्मा चेरियन" जी को प्रणाम करें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धांजलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता जी की जय!
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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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