उ. प्र. की पहली महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू : आजादी का अमृत महोत्सव

 


      !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज हैं महान स्वतन्त्रता सेनानी "दांडी मार्च" के दौरान महात्मा गाँधी जी के साथ अग्रिम पंक्ति में चलने वाली देश की सुप्रसिद्ध लेखिका कवयित्री उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल भारत कोकिला "सरोजिनी नायडू।" तारकेश्वर टाईम्स आजादी के अमृत महोत्सव के अन्तर्गत 75 महान महिला विभूतियों को याद कर रहा है। अब 31 विभूतियों को स्थान दिया जा चुका है।          

                            प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

32 - सरोजिनी नायडू  आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाली "भारत कोकिला" के नाम से जानी जाने वाली महान कवयित्री लेखिका सरोजिनी नायडू जी का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। उनकी माता का नाम वरद सुन्दरी था जो बंगला भाषा की कवयित्री थीं और पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय था जो निजाम कॉलेज के संस्थापक शिक्षाशास्त्री और प्रसिद्ध वैज्ञानिक (रसायन) थे। वे चाहते थे कि पुत्री सरोजिनी भी वैज्ञानिक बनें, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सरोजिनी नायडू जी को कविताओं से इतना अधिक प्रेम था कि वे जीवन पर्यन्त इस प्रेम को कभी त्याग नहीं सकीं। वे एक प्रतिभावान छात्रा थीं। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की होने के कारण 12 वर्ष की अल्पायु में ही मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही "लेडी ऑफ दी लेक" (झील की रानी) नामक 1300 पदों की लम्बी कविता और लगभग 2000 पंक्तियों का एक विस्तृत नाटक लिखकर अँग्रेज़ी भाषा पर अपनी पकड़ का उदाहरण दिया था। उन्हें अँग्रेज़ी, बंगला, उर्दू, तेलुगू और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था।

सरोजिनी नायडू ने मात्र 14 वर्ष की आयु में सभी अँग्रेज़ी कवियों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। वह बहुभाषाविद थीं। उन्हें शब्दों की जादूगरनी कहा जाता था। वे क्षेत्रानुसार अपना भाषण अँग्रेज़ी, हिन्दी, बंगला, गुजराती भाषा में देती थीं। प्रथम कविता संग्रह "द गोल्डन थ्रैशहोल्ड" 1905 में प्रकाशित हुआ। जो आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय है। अत्यन्त मधुर स्वर में अपनी कविताओं का पाठ करने के कारण सरोजिनी नायडू जी को "भारत कोकिला" कहा जाता था। हैदराबाद के निजाम द्वारा उच्च शिक्षा के लिये 1895 में उन्हें वजीफे पर इंगलैंड भेजा गया। इंग्लैण्ड से वापस आने पर साल 1898 में मात्र 19 वर्ष की आयु में उनका विवाह डॉ. गोविन्द राजुलु नायडू से हुआ जो फौजी डाक्टर थे। उनके चार बच्चे हुये अपने चारों बच्चों की परवरिश अपने घर हैदराबाद के सुखमय वातावरण में की। उनके घर परिवार में हमेशा हँसी प्यार और खुशहाली का वातावरण रहता था। सन् 1903 से 1917 के बीच वे रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू व अन्य नायकों से मिलीं। लन्दन में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी से उनकी पहली मुलाकात हुई। महात्मा गाँधी जी के व्यक्तित्व से वो बहुत अधिक प्रभावित हुई और इसी के बाद उनके जीवन में क्रान्तिकारी बदलाव हुआ और वह भी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़ीं और देश के लिए समर्पित हो गयीं। दक्षिण अफ़्रीका में वे महात्मा गाँधी जी की सहयोगी रहीं। उनके विनोदी स्वभाव के कारण महात्मा गाँधी जी के लघु दरबार में उन्हें "विदूषक" कहा जाता था। गोपालकृष्ण गोखले जी को वे अपना राजनीतिक पिता मानती थीं। राजनीति में सक्रिय होने के बाद गोपालकृष्ण गोखले जी के 1906 के कोलकाता अधिवेशन में उन्होंने अपने भाषण से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दांडी मार्च के दौरान महात्मा गाँधी जी के साथ सबसे आगे चलने वालों में शामिल थीं। वे महात्मा गाँधी जी की प्रिय शिष्या थीं। "जलियांवाला बाग" हत्याकांड से क्षुब्ध होकर उन्होंने 1908 में मिला सम्मान "कैसर-ए-हिन्द" लौटा दिया था। एनीबेसेन्ट और अय्यर के साथ युवाओं में राष्ट्रीय भावनाओं का जागरण करने हेतु 1915 से 1918 तक उन्होंने भारत भ्रमण किया। सन् 1919 के "सविनय अवग्या आन्दोलन" में वे महात्मा गाँधी जी की विश्वसनीय सहायक थीं। "होमरूल लीग"के मुद्दे को लेकर वे 1919 में इंग्लैण्ड गयीं। सन् 1922 में उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया। सन् 1922 से 1926 तक वे दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के समर्थन में आन्दोलनरत रहीं और महात्मा गाँधी जी की प्रतिनिधि के रूप में 1928 में अमेरिका गयीं। उन्होंने महात्मा गाँधी जी के अनेक सत्याग्रहों में भाग लिया और "भारत छोड़ो आन्दोलन" में वे जेल गयीं। अँग्रेजों द्वारा आगा खाँ महल में उन्हें सज़ा दी गयी। आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ ही उन्होंने भारतीय समाज में फैली जातिवाद, लिंग-भेद आदि जैसी सामाजिक कुरीतियों के लिए भारतीय महिलाओं को जागृत कियाा। भारत की स्वतंत्रता के लिये उन्होंने विभिन्न आन्दोलनों में सहयोग दिया था। काफी समय तक वे काँग्रेस की प्रवक्ता रहीं। अपनी प्रतिभा और लोकप्रियता के कारण 1929 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनींं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान अँग्रेजों द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया था और वे कई बार जेल भी गयीं। 1947 मेें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को एक बेहतरीन मुकाम तक ले जाने के लिये उन्हें एक विशेष कार्य-भार दिया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया था। उत्तर प्रदेश विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा प्रान्त था।
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल पद को स्वीकारते हुये उन्होंने कहा था कि - "मैं अपने को कैद कर दिये गये जंगल के पक्षी की तरह अनुभव कर रही हूँ।" लेकिन वह जवाहरलाल नेहरू जी का बेहद सम्मान करती थीं और उनकी इच्छा को टाल नहीं सकीं। जवाहरलाल नेहरू जी के लिये उनके मन में गहन प्रेम व स्नेह था। इसलिए वह लखनऊ जाकर बस गयीं और वहाँ सौजन्य व गौरवपूर्ण व्यवहार के द्वारा अपने राजनीतिक कर्तव्यों को निभाया। एक कुशल सेनापति की भाँति (सत्याग्रह हो या संगठन) उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय हर क्षेत्र में दिया। श्रीमती एनीबेसेन्ट की मित्र और राष्ट्रपति महात्मा गाँधी जी की इस प्रिय शिष्या ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश के लिये अर्पण कर दिया। सत्तर वर्ष की आयु में दो मार्च 1949 को दिल का दौरा पड़ने के कारण लखनऊ में उनकी मृत्यु हो गई। तेरह फरवरी 1964 उनकी जयन्ती के अवसर पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में 15 नये पैसे का एक डाक टिकट जारी किया। स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाली सरोजिनी नायडू जी ने भारत को आज़ादी दिलाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था। आज सरोजिनी नायडू जी भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण का वह चेहरा हैं जिससे सभी परिचित हैं। वे देश की प्रसिद्ध कवयित्री और भारत देश के सर्वोत्तम राष्ट्रीय नेताओं में से एक थीं। एक वीर धीर वीरांगना का सम्पूर्ण जीवन ही हम सभी के लिये प्रेरणादायी है। आइये इस महान स्वतन्त्रता सेनानी कुशल राजनेता सुप्रसिद्ध कवयित्री लेखिका उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल "भारत कोकिला सरोजिनी नायडू जी को हम प्रणाम करें! सादर नमन! भावभीनी श्रद्धांजलि!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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