स्वतंत्रता संग्राम की महानायिका : बीना दास - आजादी का अमृत महोत्सव

           देश की आजादी के 75 वर्ष 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन जब एक बहादुर भारतीय क्रान्तिकारी महिला ने मात्र 21वर्ष की उम्र में बंगाल के गवर्नर को अपनी गोली का निशाना बनाने की हिम्मत करके अँग्रेजों के होश उड़ा दिये थे। हम बात कर रहे हैं बीना दास की। प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

12 -  "बीना दास" - इनका जन्म - 24अगस्त 1911 को बंगाल के कृष्णा नगर में हुआ था! इनकी माता का नाम - सरला देवी और पिता का नाम - बेनी माधव दास था! माता पिता दोनों ही सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद थे! बीना दास बचपन से ही क्रान्तिकारी स्वभाव की थी! बीना दास अपनी क्रान्तिकारी बड़ी बहन कल्याणी के साथ स्कूल के दिनों से ही अँग्रेजों के खिलाफ होने वाली रैलियों मोर्चों में भाग लेना शुरू कर दिया था! पिता - बेनी माधवदास जी अपनी बेटियों और छात्रों को भारत की स्वाधीनता के लिये प्रेरित किया करते थे! नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे इनके छात्र थे! माता सरला देवी भी सामाजिक कार्यों में बेहद रूचि लेती थीं और निराश्रित महिलाओं के लिये "पूण्याश्रम" नामक संस्था चलाती थीं! यह संस्था बहुत सी क्रान्तिकारी गतिविधियों का गढ था यहाँ के भण्डार घर में स्वतन्त्रता सेनानियों के लिये हथियार व बम आदि छिपाये जाते थे। 

बताया जाता है कि माँ सरला देवी ने ही अपनी बेटी बीना दास को रिवाल्वर लाकर दी थी साथ ही वे टिन के बक्सों में बाकी क्रान्तिकारियों के लिये बम आदि लाती थीं! बीना दास अपनी स्कूली शिक्षा के बाद वे महिला छात्र संघ में शामिल हो गयी थीं! यह संघ ब्राम्ही गर्ल्स स्कूल, विक्टोरिया स्कूल, वेथ्यून कालेज और स्क्राटिस चर्च कालेज में पढने वाली छात्राओं का समूह था! बंगाल में संचालित इस समूह में 100 सदस्य थीं जो भविष्य के लिये क्रान्तिकारियों को इसमें भर्ती करते और साथ ही ट्रेनिग देते थे! संघ में सभी छात्राओं को लाठी तलवार चलाने के साथ साथ साइकिल और गाड़ी चलाना भी सिखाया जाता था! तमाम छात्राओं ने अपना घर तक छोड़ दिया था और पूण्यश्री में रहने लगी थी! कलकत्ता के वेथ्यून कॉलेज में पढते हुये 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के समय बीना दास ने अपनी कुछ अन्स छात्राओं के साथ अपने कालेज के फाटक पर धरना दिया था! वे स्वयं सेवक के रूप में काँग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित हुईं इसके बाद वे "युगान्तर दल" के क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आयीं उन दिनों इन क्रान्तिकारियों का काम था अँग्रेजी शासन के बड़े अधिकारियों को गोली का ऩिशाना बनाकर यह दिखाना था कि भारतीय उनसे कितनी नफ़रत करते हैं! 06जनवरी 1932 को बंगाल के गवर्नर "स्टेनले जैक्सन" को कलकत्ता विश्वविद्यालय के "दीक्षांत समारोह" में विद्यार्थियों को उपाधियाँ बाँटनी थी! बीना दास को भी उस समारोह में अपनी डिग्री लेनी थी! उन्होंने अपने साथियों से परामर्श करके तय किया था कि दीक्षांत समारोह में डिग्री देने के बाद गवर्नर जब भाषण देने खड़े होंगे उसी वक्त वो अपनी गोली का निशाना उन्हें बनायेगी! इन दिनों गवर्नर जैक्शन को लोग जैक्स के रूप में जानते थे! उन्होंने इंगलैण्ड की क्रिकेट टीम में अपनी सेवायें दी थी इसलिये इनका नाम मशहूर था! समारोह में जैसे ही गवर्नर ने भाषण देना शुरू किया बीना दास ने उठकर गोली चला दी! परन्तु बीना दास का निशाना चूक गया किया और गोली गवर्नर जैक्सन के कान के पास से होकर निकल गयी! गोली की आवाज से समारोह हॉल में अफरा तफरी मच गयी इतने में लेफ्टिनेन्ट कर्नल दौड़कर बीना दास का गला हाथ से दबाकर दूसरे हाथ से पिस्तौल वाली कलाई पकड़कर छत की तरफ कर दी। इसके बावजूद बीना दास एक के बाद एक गोलियाँ चलाती रहीं। उन्होंने कुल पाँच गोलियाँ चलायी! ब्रिटिश पुलिस ने बीना दास को गिरफ्तार कर लिया इसके बाद तो बीना दास सभी अख़बारों की सुर्खियाँ बन गयीं!
कलकत्ता की ग्रेजुएशन की छात्रा ने गवर्नर को गोली मारने का प्रयास किया! बीना दास पर मुकदमा चलाया गया और नौ साल के कठोर कारावास की सजा हो गयी! मुकदमे के दौरान बीना दास पर काफी दबाव बनाया गया कि वे अपने साथियों का नाम उगल दे परन्तु वे टस से मस नहीं हुई! बीना दास ने मुकदमे के दौरान कहा कि "बंगाल के गवर्नर उस सिस्टम का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने मेरे 30करोड़ देशवासियों को गुलामी की जंजीरों से ज़कड़ रखा है!" बीना दास ने आगे कहा कि वे गवर्नर की हत्या करके इस सिस्टम को हिला देना चाहती थी! सजा से पहले बीना दास ने हाई कोर्ट में कहा था कि 'मैं स्वीकार करती हूँ कि दीक्षांत समारोह में गवर्नर पर गोली मैंने चलायी थी इसके लिये मैं खुद को जिम्मेदार मानती हूँ अगर मेरी नियति मृत्यु है तो मैं इसे अर्थपूर्ण बनाना चाहती हूँ सरकार की निरंकुश प्रणाली से लड़ते हुये जिसने मेरे देश और देशवासियों पर अनगिनत अत्याचार किये हैं! मकरंद परांजये द्वारा लिखे गये संस्करण की एक समीक्षा के अनुसार बीना अपने साथियों के साथ भूख हड़ताल करके अपनी दर्द सहने की क्षमता को जाँचती थी इतना ही नहीं वह कभी ज़हरीली चीटियों के बल पर अपना पैर रख दिया करती थीं तो कभी अपनी ऊँगलियों को आग की लौ पर ! सही मायने में देखा जाये तो वो आग से खेलती थीं! कितनी भी मुश्किलें और चुनौतियाँ बीना दास के रास्ते में आयी हों लेकिन उन्होंने स्वतन्त्रता के लिये लड़ना नहीं छोड़ा था! उन्होंने उस रूढिवादी सोच को भी जड़ से हिला दिया था कि हथियार चलाना सिर्फ पुरूषों का काम है! साल 1937 में प्रान्तों में काँग्रेस सरकार बनने के बाद अन्य राजबंदियों के साथ बीना दास भी जेल से बाहर आ गयीं! भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उन्हें तीन वर्ष के लिये नज़रबन्द कर दिया गया! 
1946से 1951 तक वे बंगाल विधान सभा की सदस्या रहीं! महात्मा गाँधी जी की नौवाखाली यात्रा के समय लोगों के पुनर्वास के काम में बीना दास भी आगे बढकर हिस्सा लिया था! उन्होंने 1947 में अपने साथी स्वतन्त्रता सेनानी ज्योतिस भौमिक से शादी की लेकिन आज़ादी की लड़ाई में अपने पति की मृत्यु के बाद वे कलकत्ता छोड़कर ज़माने की नज़रों से दूर रिसीकेस के एक छोटे से आश्रम में जाकर रहने लगीं अपना गुज़ारा करने के लिये उन्होंने शिक्षिका के तौर पर काम किया और सरकार द्वारा दी जाने वाली स्वतन्त्रता सेनानी पेन्शन को लेने से इन्कार कर दिया था! सरकार द्वारा बीना दास को 1960 में "पद्मश्री" से सम्मानित किया गया! देश के लिये खुद को समर्पित कर देने वाली इस महान वीरांगना का अन्त बहुत ही दु:खगपूर्ण था! उन्होंने सड़क किनारे अपना जीवन समाप्त किया उनका मृत शरीर बहुत दिनों तक छिन्न भिन्न अवस्था में था रास्ते से गुजरने वाले लोगों को उनका शव मिला! आज़ाद भारत में उनकी लाश को कोई पहचानने वाला नहीं था पुलिस को सूचित किया गया महीनों की तलाश के बाद पता चला कि यह शव बीना दास जी का है तो लोगों के होश उड़ गये कि पद्मश्री से सम्मानित बंगाल की प्रमुख क्रान्तिकारी महिला बीना दास जी हैं जिसने कभी बंगाल के गवर्नर पर एक के बाद एक पाँच फायर किये थे! यह सब इसी आज़ाद भारत में हुआ जिसके लिये इस अग्नि कन्या ने अपना सब कुछ ताक पर रख दिया था! देश की इस मार्मिक कहानी को याद रखते हुये देर से ही सही लेकिन इस महान स्वतन्त्रता सेनानी को सलाम करना चाहिये! आइये इस बहादुर महिला को सैल्यूट करें! सादर शत शत नमन! भावपूर्ण विनम्र श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता की जय!
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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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