स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना ऊदा देवी : आजादी का अमृत महोत्सव

              !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज एक ऐसी भारतीय दलित वीरांगना की कहानी है जिनकी वीरता के लिये भारतीयों से अधिक अँग्रेजों ने दिया था सम्मान! आज हम 75 वीरांगनाओं की कड़ी में जिक्र कर रहे हैं ऊदा देवी पासी का। 

                                         प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

20 - "ऊदा देवी" - अँग्रेजों से लोहा लेने वाली एक दलित महिला सैनिक जिन्होंने ब्रिटिश सेना के 32 सैनिकों को अकेले मार गिराया था! उनकी वीरता पर उस दौर में कई लोकगीत गाये जाते थे। जिनमें से एक गीत है - "कोई उनको हब्सिन कहता कोई कहता नीच अछूत! अबला कोई उन्हें बतलाये कोई कहे उन्हें मजबूत!!" उनका जन्म - उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पास "उजरियांव" गाँव में एक दलित वर्ग की पासी जाति में 30जून 1830 के आस पास हुआ था। मात्र 13वर्ष की उम्र में उनका विवाह मक्का पासी से हुआ था जो लखनऊ के नवाब वाज़िद अली शाह की सेना में एक सैनिक थे वे बेहद साहसी और बहादुर थे। 

ऊदा देवी बचपन से ही जुझारू स्वभाव की थीं। उनके ससुराल वाले प्यार से अपनी लाडली बहू को "जगरानी" नाम से बुलाते थे। ऊदा देवी अपने पति को सैनिक के रूप में देख उनसे प्रेरित होकर वे भी वाज़िद अली शाह की बेगम हज़रत महल की महिला दस्ते में शामिल हो गयीं। उनकी बहादुरी और तुरन्त निर्णय लेने की क्षमता से नवाब वाज़िद अली शाह की बेगम और देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की नायिकाओं में से एक बेगम हज़रत महल उनसे बहुत प्रभावित हुईं और एक सैनिक के रूप में नियुक्त ऊदा देवी को महिला सेना की टुकड़ी का कमाण्डर बना दिया। महिला सैनिकों की कमाण्डर के रूप में ऊदा देवी ने देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। साल 1857 में देश में अँग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह हुआ तो लखनऊ के नवाब वाज़िद अली शाह को अँग्रेजों ने बंदी बनाकर कोलकाता निर्वासित कर दिया था उस समय विद्रोह का परचम उनकी बेगम हज़रत महल ने उठाया था। इस विद्रोह के समय हुई लखनऊ की घेराबन्दी के समय लगभग 2000 भारतीय सैनिकों के शरणास्थल "सिकन्दर बाग" पर ब्रिटिश फौजों ने चढाई कर दी और 2000 भारतीय सैनिकों का संहार कर दिया था उन शहीद हुये सैनिकों में एक ऊदा देवी के पति मक्का पासी भी थे। देश के लिये शहीद पति की मौत का सदमा उनके लिये प्रेरणा बन गया पति के बलिदान से उन्हें शक्ति मिली और उन्होंने अँग्रेजों को सबक सिखाने की कसम खायी। 16 नवम्बर 1857 सिकन्दर बाग की इस लड़ाई के दौरान ऊदा देवी पासी ने पुरूषों के वस्त्र धारण कर स्वयं को एक पुरूष के रूप में तैयार किया। अपनी महिला बटालियन को निर्देश जारी करने के बाद लड़ाई के लिये अपने साथ बंदूक और कुछ गोला बारूद लेकर सिकन्दर बाग में स्थित एक पीपल के पेड़ के ऊपर चढकर बैठ गयी और सिकन्दर बाग में प्रवेश करने वाले ब्रिटिश सैनिकों के 32 हमलावरों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।
ब्रिटिश सैनिकों को सिकन्दर बाग में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया जब तक उनका गोला बारूद खत्म नहीं हुआ। जब यह घटना घटी वहाँ ब्रिटिश सेना के कैप्टन व अधिकारीगण पहुँचे और इतनी संख्या में अपने ब्रिटिश सैनिकों की लाश देखकर अचम्भित रह गये समझ नहीं पा रहे थे गोलियाँ किधर से आ रही थीं गोलियों की आवाज़ से पता चला कि गोली पेड़ पर से आ रही थी गोलियाँ पीपल के पेड़ पर बैठा लाल जैकेट पहना एक सैनिक चला रहा था। ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ पर उन्हें गोली मारी जब कोई रास्ता नहीं बचा तो ऊदा देवी पेड़ से उतरने लगी तभी सैनिकों ने गोलियों की बौछार से शरीर छलनी कर दी और वे खून से लथपथ जमीन पर गिर पड़ी और वीर गति को प्राप्त हुईं। अँग्रेजों ने जब गौर से उन्हें देखा तो पता चला कि पुरूष वेश में कोई पुरूष सैनिक नहीं बल्कि महिला थी फिर उस महिला की पहचान की गयी तो पता चला कि महिला सेना की कमाण्डर ऊदा देवी थीं। साहसी ऊदा देवी ब्रिटिश सेना के साथ काफी देर तक संघर्ष के बाद 16नवम्बर 1857 की इस महासंग्राम में शहीद हो गयीं। कहा जाता है कि उनकी इस स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर अँग्रेज कॉल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर उन्हें श्रद्धान्जलि अर्पित की थी।
महिला सैनिकों की कमाण्डर के रूप में वीरांगना ऊदा देवी ने देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान अपने जिस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और शौर्य का परिचय दिया उससे खुद अँग्रेजी सेना भी चकित रह गयी थी और ब्रिटिश अधिकारी और पत्रकार भी खुद को रोक नहीं पाये थे उनकी वीरता की चर्चा की थी। ऊदा देवी उर्फ - "जगरानी" ने अपनी वीरता की मिशाल पेश कर सभी को अचम्भित कर दिया था। ऊदा देवी ने आज़ादी की इस लड़ाई में दलितों और महिलाओं की भूमिका को रौशन किया है। 
आइये इस महान वीरांगना के युद्ध कौशल को प्रणाम करें! सादर कोटि कोटि नमन! भावभीनी श्रद्धान्जलि!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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