भारत की आजादी में महिलाओं का योगदान : आजादी का अमृत महोत्सव : महिला स्वतंत्रता सेनानी नीरा आर्या ने पति को मारी थी गोली

 

      भारत की आज़ादी के 75 वर्ष
 आज पूरे देश में चारो तरफ "आज़ादी का अमृत महोत्सव" सेलिब्रेट किया जा रहा है। हमारे देश को अँग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने के लिये अनेकों स्वतन्त्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहूति दी है। इन महानायकों में अनेक महिला स्वतन्त्रता सेनानी भी हैं। कुछ को हम सभी जानते हैं, परन्तु अनेक महिला स्वतन्त्रता सेनानी ऐसी भी हैं जिन्हें अधिकांश लोग नहीं जानते। हम आज़ादी के 75 वर्ष के जश्न "अमृत महोत्सव" में 75 महिला महान क्रान्तिकारियों से रूबरू कराने जा रहे हैं जो हर नारी के लिये प्रेरणाश्रोत हैं। हम आरम्भ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और नीरा आर्या से। नीरा ने आजाद हिन्द फौज में भी काम किया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को बचाने के लिए अपने पति को ही गोली मार दी थी। आज हम आपको नीरा आर्या और रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बताते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाली 75 महिला स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व व कृतित्व से तारकेश्वर टाईम्स सिलसिलेवार आपको अवगत कराएगा। 
      प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव

1 - महान महिला क्रान्तिकारी - नीरा आर्या 
नीरा आर्या एक महान देशभक्त, साहसी एवम् स्वाभिमानी महिला थीं! भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान आज़ाद हिन्द फौज में रानी झाँसी रेजीमेन्ट की महिला विंग की सिपाही थीं और देश की पहली महिला जासूस थीं! नीरा आर्या का जन्म - 05 मार्च 1902 को वर्तमान उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के "खेकड़ा" शहर में हुआ था! नीरा आर्या ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जान बचाने के लिये अँग्रेजी सेना में अफसर अपने बंगाली पति श्रीकांत जगरंजनदास को गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसके लिये इन्हें काला पानी की सजा हुई जहाँ इन्हें घोर यातनायें दी गयीं थीं।
आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर अपना जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता अथवा पेन्शन स्वीकार नहीं की। नीरा आर्या को हैदराबाद में महिलायें पेदम्मा कहकर पुकारती थीं। नीरा आर्या के नाम से एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी स्थापित किया गया है। इनके जीवन पर फिल्म निर्माण होने की भी ख़बर है। महान देशभक्त नीरा आर्या को गर्व और गौरव के साथ याद किया जाता है। ऐसी बहादुर वीरांगना को सादर प्रणाम ! कोटि कोटि नमन ! भावभीनी विनम्र श्रद्धान्जलि ! जय हिन्द - जय भारत वन्दे मातरम भारत माता की जय 
    2 - "रानी लक्ष्मीबाई" 
 चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुन्देले हरबोलों की मुख हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। 
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को काशी के अस्सीघाट वाराणसी में एक मराठा परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था, जो बाजीराव पेशवा के सेवक थे। रानी लक्ष्मीबाई बचपन से ही जितनी बहादुर थीं, उतनी ही सरल स्वभाव की थींं। विनम्र स्वभाव होने के साथ ही जनता का हित चाहती थीं। बचपन से ही अँग्रेजी शासन का विरोध करती थीं। इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था। प्यार से "मनु" कहा जाता था। इनके गुरू का नाम तात्या टोपे था। उन्होंने ही रानी को बचपन से ही शस्त्र चलाना सिखाया था। लक्ष्मीबाई ने वक्त आने पर अपने पुत्र सहित मैदान में कूदकर दुश्मनों का मुकाबला बहादुरी से किया।
  "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी" अदम्य साहस के साथ बोला था लक्ष्मीबाई ने और अपनी मातृभूमि के लिये जान देने से भी पीछे नहीं हटीं। हर हाल में झाँसी की रक्षा करने की ठानी थी। मराठा राज्य सहित देश को भी सम्मान दिलाया। रानी लक्ष्मीबाई को एक औरत द्वारा प्रदर्शित ताकत और साहस का प्रतीक माना जाता है। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी में स्वयं महिला सेना का गठन किया जिसमें नारियों को योद्धा की तरह लड़ना सिखाया गया जिससे महिला सेना बनायी गयी। सन् 1857 की क्रान्ति जिसने देश भर में आज़ादी का बिगुल बजा दिया गया। वह अँग्रेजों के विरूद्ध भारत की पहली क्रान्ति और कोशिश थी, जिससे चारों ओर आज़ादी के लिये क्रांति की लहर दौड़ गयी। रानी लक्ष्मीबाई बहुत बहादुरी के साथ अँग्रेजों से लड़ीं, परन्तु अन्तिम समय में उनका घोड़ा नदी या तालाब नहीं पार कर पाया और रानी अँग्रेजों के हाथ में आ गयीं। 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। आज तक भारत में रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना कोई और नहीं हुईं। आज भी स्त्री के बहादुरी के रूप में दर्शाने के लिये उसे "झाँसी की रानी" नाम से सम्बोधित किया जाता है। रानी लक्ष्मीबाई हर नारी के लिये प्रेरणादायक हैं।
 इस वीरांगना को सादर नमन करते हैं। भावभीनी विनम्र श्रद्धान्जलि। जय हिन्द - जय भारत  वन्दे मातरम भारत माता की जय
    

 लेखिका शान्ता श्रीवास्तव सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। बार एसोसिएशन धनघटा संतकबीरनगर की अध्यक्षा भी रह चुकी हैं और सामाजिक कार्यों के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं।



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