भारत की आजादी में महिलाओं का योगदान : कस्तूरबा गांधी की जयंती पर विशेष :@ आजादी का अमृत महोत्सव महोत्सव

       !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज हम उस व्यक्तित्व, उस स्वतन्त्रता सेनानी, उस भारतीय आदर्श नारी को श्रद्धासुमन अर्पित कर नमन कर रहे हैं जिनका आज 11अप्रैल को जन्मदिवस है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अँग्रेजों के खिलाफ पुरूषों के साथ भारतीय महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर अपना योगदान दिया था। इन महिलाओं में एक नाम "बा" का है।

"कस्तूरबा गाँधी" - आज 11 अप्रैल को पूरे देश में "बा" के नाम से विख्यात कस्तूरबा गाँधी जी की जयन्ती है। आज इन धर्मपरायण आदर्श महिला को उनकी जयन्ती पर हम सभी श्रद्धा सुमन अर्पित कर भावभीनी श्रद्धान्जलि दे रहे हैं।     प्रस्तुति - शान्ता श्रीवास्तव 

भारत के स्वाधीनता संग्राम की बात करें तो हमारे मस्तिष्क में अनेकों महिलाओं का नाम प्रतिबिम्बित होता है, परन्तु ये महिला जिनका नाम ही स्वतन्त्रता का पर्याय बन गया है "बा" के नाम से विख्यात "कस्तूरबा गाँधी" जी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी (बापू) की धर्मपत्नी थीं और भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। कस्तूरबा गाँधी जी का जन्म - 11अप्रैल 1869 को काठियावाड़ के पोरबन्दर नगर में हुआ था। पिता का नाम - गोकुलदास मकन जी और माता - ब्रजकुँवरबा कपाड़िया था। पिता एक साधारण व्यापारी थे और महात्मा गाँधी जी के पिता के मित्र थे। उस जमाने में लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते नहीं थे और छोटी उम्र में ही विवाह कर देते थे। महात्मा गाँधी जी और "बा" के पिता में अच्छी मित्रता थी और ये मित्रता रिश्तेदारी में बदल गयी। मात्र सात वर्ष की उम्र में ही कस्तूरबा गाँधी जी की सगाई मोहनदास करमचन्द्र गाँधी जी से हुई और मात्र 13 वर्ष की छोटी उम्र में दोनों की शादी हो गयी। "बा" गाँधी जी से उम्र में 6माह बड़ी थीं। कस्तूरबा गाँधी के अशिक्षित थीं, इससे महात्मा गाँधी जी अप्रसन्न रहते थे। वे बात बात में ताना मारते रहते थे इसलिये "बा" का गृहस्थ जीवन "काँटों के ताज" जैसा था। परन्तु "बा" एक धर्मपरायण आदर्श भारतीय महिला होने के नाते जीवनसाथी की परिभाषा को पूर्णता प्रदान करते हुये ज़िन्दगी के हर मोड़ पर अपने पति (बापू) का साथ निभाया था। कहते हैं एक सफल आदमी के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है और इस वाक्य के एक एक शब्द को "बा" ने चरितार्थ किया। निरक्षर होने के बावजूद "बा" के अन्दर अच्छे बुरे को पहचानने का विवेक था। उन्होंने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया और कई मौकों पर गाँधी जी को चेतावनी देने से भी नहीं चूकीं। देश की आज़ादी और सामाजिक उत्थान में कस्तूरबा गाँधी जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने पति और देश के लिये समर्पित कर दिया। कस्तूरबा गाँधी जी अपने पति के साथ दक्षिण अफ्रीका जाने से लेकर अपनी मृत्यु तक गाँधी जी का अनुसरण करती रहीं। उन्होंने अपने जीवन को गाँधी जी की तरह सादा और साधारण बना लिया था। वे गाँधी जी के सभी कार्यों में सदैव उनके साथ रहीं। बापू ने स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अनेक उपवास रखे और इन उपवासों में वे हमेशा उनके साथ रहीं और देखभाल करती रहीं।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की दशा के विरोध में जब वे आन्दोलन में शामिल हुईं तब उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीने की कड़ी सजा के साथ जेल भेज दिया गया। जेल में मिला भोजन अखाद्य था तो उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया जिसके पश्चात अधिकारियों को झुकना पड़ा। सन् 1915 में "बा" गाँधी जी के साथ भारत लौट आयीं और हर कदम पर गाँधी जी का साथ दिया। कई बार जब गाँधी जी जेल गये तो उन्होंने गाँधी जी का स्थान लिया। चम्पारण सत्याग्रह के दौरान वो भी गाँधी जी के साथ गयीं और लोगों को साफ सफाई, अनुशासन, पढ़ाई आदि के महत्व के बारे में बताया। इसी दौरान गाँवों में घूमकर दवा वितरण करती रहीं। खेड़ा सत्याग्रह के दौरान भी "बा" घूम घूमकर स्त्रियों का उत्साहवर्धन करती रहीं। सन् 1922 में गाँधी जी की गिरफ्तारी के पश्चात उन्होंने वीरांगनाओं जैसा वक्तव्य दिया और इस गिरफ्तारी के विरोध में विदेशी कपड़ों के परित्याग का आह्वान किया। उन्होंने गाँधी जी को संदेश प्रसारित करने के लिये गुजरात के गाँवों का दौरा किया। सन् 1930 में दांडी और धरासन्य के बाद बापू जेल चले गये तो "बा" ने उनका स्थान लिया और लोगों का मनोबल बढाती रहीं। क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण उनका अधिकांश समय जेल में ही बीता। सन् 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान अँग्रेजी सरकार ने बापू समेत काँग्रेस के शीर्ष नेताओं को 09 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिया इसके पश्चात "बा" ने मुम्बई के शिवाजी पार्क में भाषण करने का निर्णय लिया परन्तु वहाँ पहुँचने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पूना के आगा खाँ महल में भेज दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने गाँधी जी को भी यहीं रखा था। उस समय वे अस्वस्थ रहने लगीं। दो बार दिल का दौरा पड़ा पर बच गयीं परन्तु 22 फरवरी 1944 को भयंकर दिल का दौरा पड़ा और वे हमेशा के लिये अलविदा कह दुनिया को छोड़कर चली गयीं। कस्तूरबा गाँधी जी बापू की भाँति शिक्षित नहीं थीं लेकिन कई लोग मानते हैं कि यदि "बा" और बापू का तुलनात्मक अध्ययन करें तो "बा" का व्यक्तित्व गाँधी जी की अपेक्षा अधिक बड़ा नज़र आता है। कस्तूरबा गाँधी जी गुणों की भण्डार थीं। स्वयं गाँधी जी इस बात को स्वीकारते हुये कहते थे कि "जो लोग मेरे और "बा" के निकट सम्पर्क में आये उनमें अधिक संख्या ऐसे लोगों की है जो मेरी अपेक्षा "बा" पर कई गुना अधिक श्रद्धा रखते हैं। ऐसी महान भारतीय आदर्श नारी "बा" महिलाओं के लिये प्रेरणा हैं। हम सभी आज इनकी जयन्ती पर सादर नमन करते हुये भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित करते हैं! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता एवम् सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये तहसील धनघटा, जनपद - सन्त कबीर नगर उ.प्र. बार एसोसिएशन की अध्यक्षा भी रह चुकी हैं। 

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