महान क्रांतिकारी वीरांगना झलकारी बाई : आजादी का अमृत महोत्सव

           !! देश की आज़ादी के 75 वर्ष !! 

"आज़ादी का अमृत महोत्सव" में आज एक अविश्वसनीय योद्धा, महान क्रान्तिकारी साहसी वीरांगना की कहानी है जिसके अन्दर देशभक्ति की भावना कूट कूटकर भरी थी जिसने अँग्रेजों को भ्रमित कर दिया था। जिसकी बहादुरी और राष्ट्र-प्रेम के लिये अँग्रेजों ने कहा था कि "यदि एक प्रतिशत लड़कियाँ भी इस लड़की की तरह देश-प्रेम में पागल हो जायें तो हमें अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति सहित यह देश छोड़ना पड़ेगा!" प्रस्तुति : - शान्ता श्रीवास्तव

 14 - "झलकारी बाई" - "जाकर रण में ललकारी थी! वह तो झाँसी की झलकारी थी!! गोरों से लड़ना सिखा गयी! वह भारत की ही नारी थी!!" 

भारतीय इतिहास के पृष्ठों में खोयी झलकारीबाई एक अविश्वसनीय योद्धा और महिला सैनिक थीं। झाँसी की रानी की हमशकल थीं और झाँसी के युद्ध में भारतीय बगावत के समय महत्वपूर्ण योगदान दिया था। अपनी बहादुरी और साहस से ब्रिटिश सेना के दिल में भय उत्पन्न कर दिया था। इनका जन्म - 22 नवम्बर 1830 में झाँसी (उत्तर प्रदेश) के पास के गाँव - भोजला में एक कोली परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम- जमुना देवी और पिता का नाम- सदोवर सिंह था। छोटी सी थीं तभी इनकी माँ का देहान्त हो गया। पिता - सदोवर सिंह ने बड़े लाड प्यार से एक लड़के की तरह पाल पोसकर बड़ा किया और घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में भी इन्हें प्रशिक्षित किया।

 बचपन से ही झलकारी बाई बेहद साहसी और दृढ प्रतिग्य थीं। बचपन में ही एक बार अपनी कुल्हाड़ी से इन्होंने बाघ को मार डाला था। उन दिनों की सामाजिक परिस्थितियों के कारण इन्हें औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पायी लेकिन झलकारीबाई ने खुद को एक योद्धा के रूप में विकसित किया था। इनका विवाह झाँसी की सेना में सिपाही पूरन कोली नामक सिपाही से हुआ। झलकारीबाई जितनी बहादुर थी उतने ही बहादुर सिपाही से विवाह भी हुआ था। पूरे गाँव वालों ने झलकारीबाई की शादी में भरपूर सहयोग किया। विवाह के बाद झलकारीबाई अपने पति पूरन कोली के साथ झाँसी आ गयी। एक बार गौरीपूजन के अवसर पर गाँव की महिलाओं के साथ झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई को सम्मान देने के लिये झलकारीबाई भी किले के अन्दर गयीं तो महारानी उन्हें देखकर अवाक रह गयीं क्योंकि झलकारीबाई बिल्कुल महारानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखती थीं। वहाँ आयी महिलाओं से महारानी लक्ष्मीबाई ने झलकारीबाई की बहादुरी के किस्से सुनकर प्रभावित हो गयीं और झलकारीबाई को अपनी "दुर्गा सेना" में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारीबाई ने अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना, तीरंदाजी और तलवारबाजी का प्रशिक्षण लिया।
महारानी लक्ष्मीबाई ने झलकारीबाई की बुद्धिमता एवम् कार्यक्षमता से अत्यधिक प्रभावित होकर उनको शस्त्र संचालन तथा घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिलाकर उन्हें सैन्य संचालन में दक्ष कर दिया। वे एक साधारण सैनिक की तरह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हुई थी। लेकिन बाद में वे महारानी लक्ष्मीबाई की "महिला सेना" की सेनापति और रानी की विशेष सलाहकार बनीं और रानी लक्ष्मीबाई के महत्वपूर्ण निर्णयों में भाग लेने लगी। रानी लक्ष्मीबाई की अंतरंग सखी व हमशकल होने के कारण झलकारीबाई रानी की वेश में शत्रुओं से युद्ध करती थी। हमशकल होने के कारण कोई उन्हें पहचान नहीं पाता था उनके रंगरूप और रणकौशल को देखकर अँग्रेज भ्रमित हो गये थे। उनके अन्दर देश प्रेम की भावना कूट कूटकर भरी थी वे रानी लक्ष्मीबाई के प्रति पूर्णता से समर्पित थीं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अँग्रेजी सेना के जनरल ह्यूग रोज की विशाल सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारीबाई ने बड़ी सूझबूझ से स्वामीभक्ति कर राष्ट्रीयता का परिचय दिया। रानी कालपी में पेशवा द्वारा सहयोग की प्रतीक्षा कर रही थीं, लेकिन उन्हें कोई सहायता नहीं मिल सकी क्योंकि तात्या टोपे जनरल ह्यूग रोज से पराजित हुये थे। रानी लक्ष्मीबाई के सेनानायकों में से दुल्हेराव नाम के एक गद्दार ने धोखा दिया और किले का एक संरक्षित द्वार ब्रिटिश सेना के लिये खोल दिया जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी लक्ष्मीबाई के सेनापतियों और झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई को कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर भागने की सलाह दी। रानी लक्ष्मीबाई अपने घोड़े पर बैठ कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ झाँसी से दूर निकल गयीं। झलकारीबाई के पति पूरन कोली किले की रक्षा करते हुये शहीद हो गये। लेकिन झलकारीबाई ने अपने पति की मृत्यु का शोक मनाने की बजाय अँग्रेजों को धोखा देने की योजना बनायी और रानी लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने और झाँसी की सेना की कमान अपने हाथ में ले ली और रानी लक्ष्मीबाई की परछाई बन किले के बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज के शिविर में उससे मिलने पहुँच गयी। ब्रिटिश सेना की शिविर में पहुँचने पर उन्होंने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज से मिलना चाहती है। जनरल रोज और उसके सैनिक प्रसन्न हो गये कि उन्होंने झाँसी पर कब्जा भी कर लिया और जीवित रानी ने भी समर्पण कर दिया है और अब उसके कब्जे में है।

जनरल ह्यूग झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई ही समझ रहा था। उसने झलकारीबाई से पूछा कि उनके साथ क्या करना चाहिये तो झलकारीबाई ने दृढता के साथ कहा कि मुझे फाँसी दो। जनरल ह्यूग रोज ने (रानी के वेश में उपस्थित) झलकारीबाई के साहस और नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित होकर झलकारीबाई को रिहा कर दिया। परन्तु कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अँग्रेजों से इसी युद्ध के दौरान 4 अप्रैल 1857 को झलकारीबाई वीरगति को प्राप्त हुई थीं। एक बुन्देलखण्डी किवदंती है कि - झलकारीबाई के इस उत्तर से जनरल ह्यूग रोज दंग रह गया और उसने कहा था कि "यदि भारत की एक प्रतिशत लड़कियाँ भी उनके जैसी बहादुर और देश प्रेमी हो जायें तो ब्रिटिश सेना को जल्द ही अपनी सारी सम्पत्ति छोड़कर भारत छोड़ना होगा। बुन्देल खण्ड की याद में झलकारीबाई की महानता की गाथा को याद करते हुये आज भी लोक कथाओं लोक गीतों में सुनी जा सकती है। उनका जीवन और विशेष रूप से ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ लड़ने की कला को बुन्देलखण्ड ही नहीं बल्कि पूरा भारत हमेशा याद रखेगा। दलित के तौर पर उनकी महानता ने उत्तरी भारत में दलितों के जीवन पर काफी प्रभाव डाला। भारत सरकार ने सन - 2001 में देश की इस वीरांगना के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया। झलकारीबाई ने अपने प्राणों की परवाह किये बगैर जिस प्रकार से रानी लक्ष्मीबाई और झाँसी की रक्षा की वह अद्भुत है। आइये शौर्य और वीरता की प्रतीक त्याग और बलिदान की अनूठी मिशाल पेश करने वाली हम सभी की आदर्श इस महान वीरांगना को हम प्रणाम करें और इनसे प्रेरणा लें।

सादर कोटि कोटि नमन! भावभीनी विनम्र श्रद्धान्जलि! जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम! भारत माता की जय!

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शान्ता श्रीवास्तव वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये बार एसोसिएशन धनघटा (संतकबीरनगर) की अध्यक्षा रह चुकी हैं। ये बाढ़ पीड़ितों की मदद एवं जनहित भूख हड़ताल भी कर चुकी हैं। इन्हें "महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, कन्या शिक्षा, नशामुक्त समाज, कोरोना जागरूकता आदि विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान के लिये अनेकों पुरस्कार व "जनपद विशिष्ट जन" से सम्मानित किया जा चुका है।

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