ओमिक्रोन से निपटने के लिए राहत भरी खबर

 

                          (ऋषभ शुक्ल) 

 नई दिल्ली। दुनिया भर में कोरोना वायरस के डेल्टा और डेल्टा प्लस वैरिएंट के बाद ओमिक्रॉन वैरिएंट (Omicron Variant) ने तबाही मचानी शुरू कर दी है। दक्षिण अफ्रीका के बाद यह नया वैरिएंट 90 से अधिक देशों में फैल चुका है। भारत में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां तक कि कई एक्सपर्ट ओमिक्रॉन की वजह से देश में कोरोना महामारी की तीसरी लहर आने की आशंका जाहिर कर रहे हैं। ओमिक्रॉन को लेकर आशंकाओं और डर के माहौल के बीच वैज्ञानिकों ने एक राहत भरी खबर दी है।

वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने उन एंटीबॉडी की पहचान की है, जो ओमिक्रॉन और कोरोनावायरस के अन्य वैरिएंट को बेअसर करने में सक्षम हैं। ये एंटीबॉडीज वायरस के उन हिस्सों को निशाना बनाती हैं जिनमें म्यूटेशन (जीन में बदलाव) के दौरान भी कोई बदलाव नहीं होता है। नेचर जर्नल में पब्लिश हुई इस स्टडी से वैक्सीन (Vaccine) और एंटीबॉडी (Antibodies) के इलाज को डेवलप करने में मदद मिल सकती है, जो न केवल ओमिक्रॉन बल्कि भविष्य में कोरोनावायरस के अन्य वैरिएंट के खिलाफ भी प्रभावी रहेंगे। यानी अब अगर ओमिक्रॉन के बाद किसी और वैरिएंट का भी खतरा आता है तो इन एंटीबॉडीज के जरिए उनसे भी निपटा जा सकेगा।

बार-बार फैलने से रोका जा सकता है

'यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन स्कूल ऑफ मेडिसिन' में एसोसिएट प्रोफेसर डेविड वेस्लर (David Veesler) ने कहा, "यह रिसर्च हमें बताती है कि कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन के सबसे सुरक्षित हिस्से को टारगेट करने वाली एंटीबॉडी पर ध्यान देकर उसकी लगातार खुद को नए रूप में ढालने की क्षमता से लड़ सकते हैं।" ओमिक्रॉन वेरिएंट के स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन की संख्या 37 है। स्पाइक प्रोटीन, वायरस का वो नुकीला हिस्सा होता है जिसके जरिए वह मानव कोशिकाओं में प्रवेश करता है और उनसे जुड़कर संक्रमण फैलाता है। कोरोना वायरस के ओमिक्रॉन वैरिएंट में हुए इन बदलावों से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों ये वैक्सीन लगावाने वाले और पहले से संक्रमित हो चुके लोगों को दोबारा संक्रमित करने में सक्षम है।

वेस्लर ने कहा, "हम जिन सवालों के जवाब देने की कोशिश कर रहे थे, वे थे कि ओमिक्रॉन वैरिएंट में स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन ने कोशिकाओं से जुड़ने और इम्यूनिटी की एंटीबॉडी से बचने की क्षमता को कैसे प्रभावित किया है।"

    स्यूडोवायरस का उपयोग किया

इन म्यूटेशन के प्रभाव का आकलन करने के लिए रिसर्चर्स ने स्यूडोवायरस (Pseudovirus) बनाया जिसमें ओमिक्रॉन जैसे स्पाइक प्रोटीन थे। दूसरी तरफ, कोविड महामारी की शुरुआती दौर की संरचना वाला स्यूडोवायरस बनाया। शोधकर्ताओं ने वायरस के अलग-अलग रूपों की तुलना की और पाया कि महामारी की शुरुआती दौर के वायरस में पाए जाने वाले स्पाइक प्रोटीन की तुलना में ओमिक्रॉन वैरिएंट स्पाइक प्रोटीन 2.4 गुना बेहतर ढंग से खुद को मानव कोशिकाओं से बांधने में सक्षम था।

   तीसरी बूस्टर डोज जरूरी

टीम ने अलग-अलग वैरिएंट पर एंटीबॉडी के प्रभाव की भी जांच की। शोधकर्ताओं ने पाया कि उन लोगों की एंटीबॉडी जो पहले के वैरिएंट से संक्रमित थे और जिन्होंने अभी सबसे अधिक उपयोग की जा रही 6 वैक्सीन में से कोई वैक्सीन लगवाई थी, सभी में संक्रमण को रोकने की क्षमता कम हो गई थी।

वेस्लर ने कहा, जो लोग संक्रमित हो गए थे, ठीक हो गए थे और फिर वैक्सीन की दोनों खुराक ले चुके थे, उनकी एंटीबॉडी ने भी एक्टिविटी को कम दिया था, लगभग 5 गुना कम। वहीं किडनी डायलिसिस वाले मरीजों का ग्रुप, जिन्हें मॉडर्न और फाइजर द्वारा बनाई हुई वैक्सीन की खुराक के साथ बूस्टर मिला था, उनमें एंटीबॉडी की एक्टिविटी में केवल 4 गुना कमी दिखी थी। इससे पता चलता है कि एक तीसरी खुराक वास्तव में ओमिक्रॉन के खिलाफ मददगार है। वेस्लर ने कहा कि एंटीबॉडीज, वायरस के कई अलग-अलग वैरिएंट में संरक्षित क्षेत्रों की पहचान करके उन्हें बेअसर करने में सक्षम हैं। जिससे पता चलता है कि इन हिस्सों को टारगेट करने वाली वैक्सीन और एंटीबॉडी ट्रीटमेंट नए वैरिएंट के खिलाफ प्रभावी हो सकते हैं। 

    भारत में ओमिक्रॉन की स्थिति

देश में ओमिक्रॉन संक्रमण तेजी से फैल रहा है और अभी तक 804 ओमिक्रॉन वैरिएंट के मरीज भारत में मिल चुके हैं। जिनमें से दिल्ली में ही कुल 238 केस हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 167 मामले हैं। वहीं कुल संक्रमितों की बात की जाए तो भारत में अभी 77,002 एक्टिव केस हैं।

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