जॉबकार्ड हड़पकर मनरेगा मजदूरी में गोलमाल, जिम्मेदार चुप

 

                            (अर्जुन सिंह) 

 मेंहदावल (संतकबीरनगर) । स्थानीय क्षेत्र में मनरेगा मजदूरों के साथ छल करते हुए जॉबकार्ड हड़पकर मनमाने तरीके से काम कराते हुए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को पलीता लगाया जा रहा है। ऐसे गम्भीर मामले में जिम्मेदार अधिकारियों - कर्मचारियों की आंखों पर कमीशन की पट्टी बंधी दिखाई दे रही है। मतलब साफ है कि कुछ मनरेगा श्रमिकों से काम कराकर और कुछ से बिना काम कराये मजदूरी का भुगतान लेकर बन्दरबांट किया जा रहा है। मनरेगा मजदूरी में गोलमाल करने के लिए बाकायदा एक काकस काम कर रहा है, जिसे श्रमिकों के वास्तविक हित से कोई सरोकार नहीं है।

 विकास खण्ड मेहदावल के ग्राम पंचायत ददरा मे मनरेगा मजदूर बिना जाब कार्ड के विगत कई पंचायती कार्यकाल से मनरेगा मजदूरी कर रहे है। जबकि आज की पारदर्शी व्यवस्था मे बिना जाब कार्ड के न मनरेगा मजदूरी किया जा सकता है और न ही मजदूरी का भुगतान लिया जा सकता है । जाब कार्ड का सीधा सम्बन्ध मनरेगा मजदूर के एकांउट नम्बर से अटैच होता है और सरकार से प्राप्त होने वाली मजदूरी सीधे बैंक खाते में जाती है। यह और बात है कि विशेष परिस्थिति में अनुमति लेकर नगद भुगतान किया जा सकता है । बताते चलें कि विकास खण्ड मेंहदावल के ग्राम पंचायत ददरा मे हुए पारदर्शिता , सहभागिता एवं जवाबदेही के अन्तर्गत वर्ष 2020/2021 के मनरेगा कार्य और प्रधानमंत्री आवास योजना ( ग्रामीण ) के सोशल आडिट बैठक के दौरान मिली जानकारी के अनुसार 2020/2021 मे 6076 मानव दिवस मे कुल 13 काम में रु. 1221477 ( बारह लाख इक्कीस हजार चार सौ सतहत्तर रूपये ) खर्च हुआ है । ग्राम पंचायत मे मनरेगा मजदूरों का कुल 548 जाब कार्ड है। लेकिन किसी मनरेगा मजदूर के पास जाब कार्ड नहीं है। बैठक के दौरान ग्रामीणों द्वारा बताया गया कि भले ही सोशल आडिट टीम द्वारा एमआईएस रिपोर्ट के तहत इस ग्राम पंचायत के कुल मनरेगा मजदूरों का 548 जाब कार्ड का रिकार्ड संख्या बताया जा रहा है लेकिन कई पंचायती कार्यकाल से मनरेगा मजदूरों के पास कोई जाब कार्ड नहीं है। शुरुआती दौर के ग्राम प्रधान द्वारा जबसे जाब कार्ड अपने पास रख लिया गया तबसे आज तक जाब कार्ड देखना नसीब नही हुआ ।
उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बनने वाले जाब कार्ड मनरेगा मजदूरों को साल में 100 दिन का काम देने की गारंटी देता है। यही नहीं जाब कार्ड के जानकारों की मानें तो जाब कार्ड से मनरेगा मजदूरों का फोटो युक्त कार्य करने की जानकारी के साथ उन्हें कितना दिन काम मिला है उसकी जानकारी हो जाती है। इसीलिए हर मनरेगा मजदूरों के पास जाब कार्ड होना अनिवार्य है। ऐसे में यह सवाल यह है कि इतनी पारदर्शी व्यवस्था में बगैर जाब कार्ड के मनरेगा मजदूरों से कैसे काम कराया जा रहा है और कैसे उन्हे अपने बैंक खाते से मजदूरी मिल जा रही है? सवाल यह भी उठता है कि इतने वर्षो से सक्षम अधिकारियों द्वारा इसे संज्ञान मे क्यों नही लिया जा रहा है? पूर्व हुए कई सोशल आडिट के बाद भी मामला दबा क्यों रह गया ?
 सूत्रों की मानें तो निश्चित कमीशन के चलते ही मनरेगा प्रभावित हो रहा है, जो प्रत्येक फाइल पर तय है । जिसका प्रमाण विकास खण्ड बघौली है जहां के ग्राम प्रधानों द्वारा धरने पर बैठने और धरना समाप्ति के दौरान फाइल कमीशन भुगतान के बाद दुबारा भुगतान की स्थिति बनी नजर आ रही थी। यही नहीं इसका एक उदाहरण और है जहां कथित लोग ग्राम प्रधान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और सक्षम अधिकारियों द्वारा उन्हें ग्राम प्रधान मानकर तवज्जो दिया जा रहा है। ऐसे में दायित्व का कितना महत्व होगा इसे खुले तौर पर समझा जा सकता है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिम्मेदारों की जानकारी में पसीना बहाने वाले मनरेगा मजदूरो के साथ अन्याय हो रहा है जिम्मेदार मलाई काट रहे हैं। जिम्मेदारों द्वारा मामले निष्पक्ष सघन जांच कर व्यवस्था ठीक कराते हुए दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो स्थिति बदतर हो जाएगी और कभी भी बड़ा विस्फोट हो सकता है।

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