तालिबान में मंत्री पद के लिए कुटिल चाल, बरादर को गुनाह की सजा

 

                      (अंकुर श्रीवास्तव) 

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को कुछ दिनों पहले तक तालिबान सरकार का संभावित मुखिया माना जा रहा था। मंगलवार को जब सरकार के प्रमुख चेहरे सबके सामने आए तो सभी चौंक गए। बरादर की जगह अफगानिस्तान की कमान आतंकी मुल्ला हसन अखुंद को सौंप दी गई।

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का गठन हो चुका है। मंगलवार रात सरकार के प्रमुख चेहरे सभी के सामने आ गए। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंधित आतंकी हसन अखुंद को अफगानिस्तान का नया कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया है। इस पद के लिए पहले मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नाम के कयास लगाए जा रहे थे जिन्हें अब अखुंद का सहायक और अफगानिस्तान का उप प्रधानमंत्री बनाया गया है। वह मुल्ला बरादर ही थे जिन्होंने अमेरिका के साथ शांति वार्ता में तालिबान का नेतृत्व किया था और उस समझौते पर साइन किए थे जिसके चलते अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापस गए। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि तालिबान की सत्ता में वापसी की जमीन समूह के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख मुल्ला बरादर ने ही तैयार की तो क्यों और कैसे सरकार बनाते समय उनका पत्ता कट गया। 

 पिछले शासन में था उप रक्षा मंत्री

अखुंद अब Islamic Emirate of Afghanistan के कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं। बीते दो दशकों से वह तालिबान के रहबरी शूरा या लीडरशिप काउंसिल के मुखिया हैं। उम्मीद की जा रही थी कि तालिबान सरकार का नेतृत्व मुल्ला बरादर करेंगे। 'बरादर' लड़ाई के दौरान इस्तेमाल किया जाने वाला एक नाम है जो मुल्ला अब्दुल गनी को तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर से मिला था। तालिबान के पिछले शासन में मुल्ला उप रक्षा मंत्री थे। मुल्ला उमर के सबसे भरोसेमंद कमांडरों में से एक अब्दुल गनी बरादर को 2010 में दक्षिणी पाकिस्तानी शहर कराची में सुरक्षाबलों ने पकड़ लिया था, लेकिन बाद में तालिबान के साथ डील होने के बाद पाकिस्तानी सरकार ने 2018 में उसे रिहा कर दिया था।

 ऐसे कटा मुल्ला बरादर का पत्ता

कई विश्‍लेषकों का यह भी कहना है कि मुल्‍ला बरादर को पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के चीफ मोहम्‍मद फैज के इशारे पर साइड लाइन किया गया है। पाकिस्‍तान नहीं चाहता है कि कोई प्रभावशाली नेता तालिबान सरकार में शीर्ष पर बैठे। उसे डर है कि कहीं मुल्‍ला बरादर अमेरिकी दबाव या किसी और के इशारे पर काम न करने लगे। पाकिस्‍तान ने हक्‍कानी नेटवर्क पर दांव लगाया है और वे चाहते हैं कि हक्‍कानी नेटवर्क का पूरे तालिबान सरकार पर कब्‍जा रहे। वे अपने कई लोगों को सरकार में शामिल करना चाहते हैं।

खबरों की मानें तो सरकार बनाने के पीछे देरी का कारण बरादर के नाम को लेकर पाकिस्तान की असहमति थी। कई दिनों तक बरादर खेमा तालिबान के शीर्ष नेतृत्व को मनाने की कोशिश करता रहा लेकिन पाकिस्तान सरकार के प्रमुख के रूप में हक्कानी या अपने किसी आदमी को चाहता था। आखिरकार पाकिस्तान इसमें कामयाब हो गया और अखुंद को सत्ता के शीर्ष पर बिठा दिया। मुल्‍ला बरादर की अमेरिका के साथ नजदीकियां उनके खिलाफ हो गईं और उन्‍हें मुल्‍ला हसन का डेप्‍युटी बनना पड़ रहा है। माना जा रहा है कि आठ साल जेल में गुजारने का नतीजा मुल्ला बरादर को अब भुगतना पड़ा है। जेल में रहने के दौरान अखुंद ने रहबरी शूरा से लेकर तालिबान के शीर्ष नेतृत्व के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर ली और बरादर को किनारे कर दिया।

कैसे मिलेगी इस सरकार को मान्यता

दुनिया में ऐसा पहली बार हुआ है, जब दो या दो से अधिक वैश्विक आतंकी किसी सरकार में सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे हुए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन-जिन देशों ने इन आतंकियों पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं, वे आखिरकार तालिबान सरकार को मान्यता कैसे देंगे। अगर ये देश नियमों तो ताक पर रखकर मान्यता देते हैं तो इसे आतंकवाद के साथ समझौता माना जाएगा। दूसरी तरफ ऐसी मिसाल कायम होगी कि आतंकी होने के बावजूद सरकार का प्रमुख बनने पर सभी अपराध माफ हो जाते हैं।

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