हाईकोर्ट ने दिया गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव

 

                          (संतोष दूबे) 

 प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैदिक, पौराणिक, सांस्कृतिक महत्व व सामाजिक उपयोगिता को देखते हुए गाय को  राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारत में गाय को माता मानते हैं। यह हिंदुओं की आस्था का का विषय है। आस्था पर चोट से देश कमजोर होता है। कोर्ट ने कहा गो मांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है। जीभ के स्वाद के लिए जीवन का अधिकार नहीं छीना जा सकता। बूढ़ी बीमार गाय भी कृषि के लिए उपयोगी है। इसकी हत्या की इजाजत देना ठीक नहीं। यह भारतीय कृषि की रीढ़ है।

कोर्ट ने कहा पूरे विश्व में भारत ही एक मात्र देश है जहां सभी संप्रदायों के लोग रहते हैं। पूजा पद्धति भले ही अलग हो, सोच सभी की एक है। एक दूसरे के धर्म का आदर करते हैं। कोर्ट ने कहा गाय को मारने वाले को छोड़ा तो फिर अपराध करेगा। कोर्ट ने संभल के जावेद की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने दिया है। जमानत अर्जी पर शासकीय अधिवक्ता एसके पाल और एजीए मिथिलेश कुमार ने प्रतिवाद किया। याची पर साथियों के साथ खिलेंद्र सिंह की गाय चुराकर जंगल में  अन्य गायों सहित मारकर मांस इकट्ठा करते टार्च की रोशनी में देखें जाने का आरोप है। 8 मार्च 21 से जेल में बंद हैं। शिकायतकर्ता ने गाय के कटे सिर से पहचान की। आरोपी मोटरसाइकिल छोड़ कर भाग गए।
कोर्ट ने कहा 29 में से 24 राज्यों में गोवध प्रतिबंधित है। एक गाय जीवन काल में 410 से 440 लोगों का भोजन जुटाती है। और गोमांस से केवल 80 लोगों का पेट भरता है। महाराजा रणजीत सिंह ने गो हत्या पर मृत्यु दण्ड देने का आदेश दिया था। कई मुस्लिम व हिंदू राजाओं ने गोवध पर रोक लगाई। इसका मल मूत्र असाध्य रोगों में लाभकारी है। गाय की महिमा का वेदों पुराणों में बखान किया गया है। रसखान ने कहा जन्म मिले तो नंद के गायों के बीच मिले। गाय की चर्बी को लेकर मंगल पाण्डेय ने क्रांति की। संविधान में भी गो संरक्षण पर बल दिया गया है।

   हाईकोर्ट ने की यह टिप्पणी

मौलिक अधिकार केवल गोमांस खाने वालों का ही नहीं है, बल्कि जो गाय की पूजा करते हैं और आर्थिक रूप से गायों पर निर्भर हैं, उनहें भी सार्थक जीवन जीने का अधिकार है। जीवन का अधिकार मारने के अधिकार से ऊपर है और गोमांस खाने के अधिकार को कभी भी मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता है।गाय बूढ़ी और बीमार होने पर भी उपयोगी होती है, और उसका गोबर, मत्र कृषि, दवा बनाने में भी काम आता है। साथ ही सबसे बढ़कर जो मां के रूप में पूजी जाती है। किसी को भी गाय को मारने का अधिकार नहीं दिया जा सका, चाहे वह बूढ़ी और बीमार ही क्यों न हो।

ऐसा नहीं है कि केवल हिंदू ही गायों के महत्व को समझ चुके हैं, मुसलमानों ने भी अपने शासनकाल में गाय को भारत की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है, गायों के वध पर पांच मुस्लिम शासकों ने प्रतिबंध लगा दिया था। बाबर, हुमायूं और अकबर ने भी अपने धार्मिक उत्सव में गायों की बलि पर रोक लगा दी थी। मैसूर के नवाब हैदर अली ने गोहत्या को दंडनीय अपराध बना दिया।समय-समय पर देश की विभिन्न अदालतों और सुप्रीम कोर्ट ने गाय के महत्व को देखते हुए इसके संरक्षण, प्रचार, देश की जनता की आस्था, संसद और विधानमंडल को ध्यान में रखते हुए कई फैसले दिए हैं। विधानसभा ने भी गायों के हितों की रक्षा के लिए समय के साथ नए नियम बनाए हैं। कई बार गोरक्षा और समृद्धि की बात करने वाले गोभक्षी बन जाते हैं। सरकार गोशाला का निर्माण भी करवाती है, लेकिन जिन लोगों को गायों की देखभाल का जिम्मा सौंपा गया है, वे गाय की देखभाल नहीं करते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां गोशाला में गायों की भूख और बीमारी से मौत हो जाती है। उन्हें गंदगी के बीच रखा गया है। भोजन के अभाव में गाय पॉलीथिन खाती है और परिणामस्वरूप बीमार होकर मर जाती है। दूध देना बंद कर चुकी गायों की हालत सड़कों और गलियों में देखी जा सकती है। बीमार और क्षत-विक्षत गायों को अक्सर लावारिस देखा जाता है। ऐसे में बात सामने आती है कि वे लोग क्या कर रहे हैं, जो गाय के संरक्षण के विचार को बढ़ावा देते हैं। कभी-कभी एक-दो गायों के साथ फोटो खिंचवाने से लोग सोचते हैं कि उनका काम हो गया, लेकिन ऐसा नहीं है। गाय की रक्षा और देखभाल सच्चे मन से करनी होगी और सरकार को भी उनके मामले पर गंभीरता से विचार करना होगा। देश तभी सुरक्षित रहेगा, जब गायों का कल्याण होगा, तभी देश समृद्ध होगा। खासतौर पर जो लोग महज दिखावा करके गाय की रक्षा की बात करते हैं, उन्हें गोरक्षा को बढ़ावा देने की उम्मीद छोड़नी होगी।

सरकार को भी संसद में एक विधेयक लाना होगा और गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना होगा और गायों को नुकसान पहुंचाने की बात करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाना होगा। गोशाला आदि बनाकर गोरक्षा की बात करने वालों के लिए भी कानून आना चाहिए, लेकिन उनका गौ रक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, उनका एकमात्र उद्देश्य गौ रक्षा के नाम पर पैसा कमाना है। गौ रक्षा और संवर्धन किसी एक धर्म के बारे में नहीं है, बल्कि गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति को बचाने का काम देश में रहने वाले हर नागरिक का है, चाहे वह किसी भी धर्म या पूजा का हो।

हमारे देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं कि जब भी हम अपनी संस्कृति को भूले, विदेशियों ने हम पर हमला किया और हमें गुलाम बना लिया और आज भी अगर हम नहीं जागे तो हमें तालिबान के निरंकुश आक्रमण और अफगानिस्तान पर कब्जे को नहीं भूलना चाहिए। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां अलग-अलग धर्म के लोग रहते हैं, जो भले ही अलग-अलग पूजा करते हों, लेकिन देश के लिए उनकी सोच एक ही है और वे एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान करते हैं। वे रीति-रिवाजों और भोजन की आदतों का सम्मान करते हैं। ऐसे में जब हर कोई भारत को एकजुट करने और उसकी आस्था का समर्थन करने के लिए एक कदम आगे बढ़ाता है तो कुछ लोग जिनकी आस्था और विश्वास देश हित में बिल्कुल भी नहीं है, वे देश में इस तरह की बात करके ही देश को कमजोर करते हैं।

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