कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज में देर हो जाए तो क्या

                   (प्रशांत द्विवेदी) 

कोरोना (COVID - 19) वैक्सीन की दोनों डोज लगाना ही नहीं, बल्कि समय पर लगाना भी ज़रूरी है। दो डोज में अंतर ज़्यादा होगा तो अधिक लोगों को मिल सकेगा टीका​​

भारत में कोरोना की दूसरी लहर तेज़ी से बढ़ रही है। अनुमान है कि कुछ ही हफ्तों में यह अपने चरम पर होगी। इसके बाद आएगी ढलान और फिर थोड़ा राहतभरा दौर। लेकिन सवाल है कि क्या महामारी की तीसरी लहर भी आएगी? अगर हम वैक्सीनेशन तेज़ी से करते हैं तो उम्मीद है कि नहीं। जितने ज़्यादा लोगों को टीका लगेगा, वायरस के फैलने का ज़रिया उतना ही कम हो जाएगा। पर यह इतना आसान नहीं। भारत के टीकाकरण अभियान में दो बड़ी मुश्किलें हैं। पहली बाधा है वैक्सीन सप्लाई का पर्याप्त न होना। दूसरा अवरोध हमने ख़ुद खड़ा किया है। हमारे यहां वैक्सीन की दो डोज के बीच का अंतर बहुत कम है।

कोविशील्ड की दो डोज 6 से आठ हफ्ते के गैप पर दी जा रही है, जबकि कोवैक्सीन में यह अंतर है चार से छह हफ्तों का। इसका मतलब है कि अगर हम अगले दो महीनों में टीके की 20 करोड़ डोज तैयार भी कर लें, तो उससे 20 करोड़ लोगों का टीकाकरण नहीं हो सकता। इसमें से एक बड़ी मात्रा दूसरी डोज के लिए अलग रखनी होगी। पिछले साल दिसंबर में इसी तरह के असमंजस में फंसा हुआ था ब्रिटेन। कोरोना के नए वैरिएंट ने नए मरीजों की बाढ़ ला दी थी वहां। तब वहां रणनीति अपनाई गई कि सभी को पहली डोज पहले दी जाएगी। ब्रिटेन ने इस बात पर भरोसा किया कि कुछ लोगों को दोनों डोज लगाकर पूरी सुरक्षा देने से बेहतर है सभी लोगों को एक डोज लगाकर थोड़ी-थोड़ी सुरक्षा दे देना। इसकी आलोचना भी हुई। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसा करना ख़तरनाक हो सकता है। अभी तक क्लीनिकल ट्रायल नहीं हुआ है इसका। लेकिन चार महीने बाद के परिणाम बताते हैं कि ब्रिटेन ने बिल्कुल सही क़दम उठाया था। इसके बाद से दुनिया के कई और देश वैक्सीन की दूसरी डोज को देने में देरी कर रहे हैं ताकि पहली पर ज़्यादा फोकस किया जा सके। जर्मनी में एस्ट्राजेनेका वैक्सीन या कोविशील्ड की दोनों डोज के बीच 12 हफ्तों का गैप है। कनाडा में यह गैप चार महीने है।

ब्रिटेन का फैसला हालांकि विवादास्पद था, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने हताशा में यूं ही एक जुआ खेल दिया। वेलकम फाउंडेशन की एक रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिकों ने विशेषज्ञों के इस फैसले पर भरोसा किया कि वैक्सीन आमतौर पर कैसे काम करती है। उनके पास एस्ट्राजेनेका के ट्रायल के डेटा भी थे। एस्ट्राजेनेका ने पिछले साल नवंबर में ट्रायल के नतीजे प्रकाशित किए। इनसे पता चला कि जिन वॉलंटिअर्स को ग़लती से आधी खुराक पहले दी गई थी, उनकी इम्युनिटी उनसे बेहतर रही, जिन्हें दो पूरी डोज वैक्सीन लगाई गईं। इन आधी खुराक वालों को बाद में दूसरी डोज भी लगा दी गई थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल में पब्लिश एक लेख में सवाल उठाया गया कि बेहतर इम्युनिटी आधी खुराक की वजह से आई या दो डोज में गैप के कारण।

एक वैक्सीन को इम्युनिटी बनाने में वक़्त लगता है। टीका लगाने के बाद पहले दो हफ्ते इसका असर बेहद मामूली होती है, नगण्य। लेकिन फिर इम्युनिटी बढ़ने लगती है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि दूसरी डोज में बहुत अधिक देरी कर दी जाए, क्योंकि तब पहली डोज का असर कम होने लगेगा। अब चुनौती उस सही समय को तलाशने की है, जब पहली डोज का असर एकदम पीक पर होता है ताकि उसी समय दूसरी खुराक दी जा सके और इम्युनिटी बढ़ती जाए। एस्ट्राजेनेका ने ख़ुद चार से 12 हफ्तों का गैप सुझाया था। वेलकम फाउंडेशन की एक रिपोर्ट कहती है कि पहली खुराक से मिली सुरक्षा के कम होने के लिए 12 सप्ताह का समय पर्याप्त नहीं होगा। फिर सही समय क्या है ?

मार्च में लैंसेट का डेटा आया और इसने बताया कि ब्रिटेन ने एकदम सही किया था। इस डेटा के मुताबिक, एस्ट्राजेनेका की सिंगल डोज चौथे हफ्ते से लेकर तीसरे महीने के आखिर तक 76 फ़ीसदी प्रभावी होती है। इस दौरान एंटीबॉडी का स्तर बना रहता है। केवल थोड़ी ही कमी आती है इसमें। वहीं, स्टैट की एक रिपोर्ट कहती है कि फाइजर-बायोटेक और मॉडर्ना की वैक्सीन पहले शॉट के बाद देती है 80 फ़ीसदी सुरक्षा। सेकंड डोज के बाद यह बढ़कर हो जाती है 90 प्रतिशत। थोड़ी और डिटेल में जाएं तो 12 हफ्तों के गैप पर एस्ट्राजेनेका की क्षमता 81.3 फ़ीसदी तक हो गई। चार हफ्तों का अंतर रहने पर यह आंकड़ा केवल 55.1 प्रतिशत पर था। वैक्सीन लगवाने वालों में जिनकी उम्र 55 साल से कम थी, उनमें 6 हफ्तों की तुलना में 12 हफ्तों में एंटीबॉडी रिस्पॉन्स दोगुने से भी ज़्यादा रहा।

ये सारे आंकड़े तो यही कहते हैं कि दो डोज के बीच थोड़ा अधिक अंतर है ज़रूरी। फिर भी कुछ सवाल अपनी जगह हैं। ब्रिटेन को देखें, मार्च के अंत तक उसने अपनी आधी से ज़्यादा वयस्क आबादी को टीके की कम से कम एक डोज लगा दी थी। आगे उम्मीद है कि जुलाई तक सभी वयस्कों को एक डोज लग जाएगी। वहां कोरोना के नए केस तेज़ी से घटे हैं। मौतें कम हो रही हैं। बहुत-सी बंदिशें हटा ली गई हैं और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के पिछले साल के मुक़ाबले अधिक रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन दो डोज के बीच लंबे अंतर के आलोचकों का तर्क है कि यह रणनीति बुजुर्गों पर शायद कम प्रभावी हो, जिनका इम्युन सिस्टम युवाओं की तुलना में वैक्सीन के प्रति कम रिस्पॉन्स देता है। संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंथोनी फुकी एक दूसरा ही डर जताते हैं। उनका कहना है कि डोज के बीच अंतर बढ़ाने से लोगों में यह मेसेज जा सकता है कि दूसरी खुराक की ज़रूरत नहीं। अब भारत की बात करें तो बड़ी संख्या में सीनियर सिटिजंस को पहले ही वैक्सीन लगाई जा चुकी है। जो लोग दूसरी डोज लेना भूल गए, उनके लिए भी दूसरा रास्ता तलाशा जा सकता है। लेकिन अभी सबसे बड़ी चिंता है वैक्सीनेशन को तेज़ी से बढ़ाना। इसके लिए दो डोज के बीच अधिक अंतर ज़रूरी हो सकता है।

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