नशा चाहिए ? ध्यान को आजमाएं

 

                       (प्रशांत द्विवेदी) 

नशा अलौकिक अनुभव का रास्ता तो खोलता है, लेकिन वह एक ऐसी उड़ान है जिस पर आपका वश नहीं होता। आप नहीं जानते कि स्वर्ग में पहुंचेंगे या नरक में

‘मेरी दो बेटियां हैं, जो एक न एक दिन ड्रग्स लेंगी। और तब, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि वे अपने लिए सही ड्रग्स चुनें। अगर मुझे पता चले कि वे कोकीन ले रही हैं तो शायद मेरी रातों की नींद उड़ जाए। लेकिन अगर उन्होंने अपनी एडल्ट लाइफ में एक बार भी एलएसडी या साइकेडेलिक ट्राई नहीं की तो मुझे हैरानी होगी। आख़िर उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे ज़रूरी अनुभव मिस जो कर दिया।’ अपने बच्चों के लिए कोई ऐसा कैसे सोच सकता है? कौन बाप होगा जो चाहेगा कि उसके बच्चे ड्रग्स लें? इन सवालों के जवाब चाहिए तो इस कहानी की तह तक जाना होगा। तो चलिए, सबसे पहले मिलते हैं दो बेटियों के इस पिता से। यह हैं सैम हैरिस। अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट, लेखक और फिलॉसफर। उम्र 53 साल। कई बेस्टसेलर क़िताबें लिख चुके हैं। 18-20 साल की उम्र में सैम को ड्रग्स की लत लग गई। उस वक़्त स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी से बीए कर रहे थे, लेकिन सब कुछ छोड़कर भारत आ गए।

वह सालभर भारत, नेपाल, थाईलैंड में किसी खानाबदोश की तरह घूमते और ड्रग्स लेते रहे। अपनी क़िताब ‘लाइंग’ में वह लिखते हैं कि तब उन्होंने कंधों तक लंबे बाल रख लिए थे और किसी भारतीय रिक्शे वाले की तरह कपड़े पहना करते थे। सैम के मुताबिक़, शुरू में सिलोसिबिन और एलएसडी लेने का उनका अनुभव बेहद शानदार और सकारात्मक था। वह कहते हैं, ‘यह मेरे लिए नई दुनिया थी। मैं अपने मन का आध्यात्मिक अध्ययन कर रहा था। मेरा दिमाग़ ठीक वैसी अवस्था में था, जैसा उसे होना चाहिए। लगता था जैसे मैं स्वर्ग में हूं, लेकिन फिर एक दिन मेरे सामने नरक का दरवाज़ा खुला।’

हैरिस नेपाल में थे। पोखरा में फेवा लेक के पास। उन्होंने 400 माइक्रोग्राम एलएसडी ली। इससे पहले वह दस बार इस ड्रग को ले चुके थे। कभी कुछ ग़लत नहीं हुआ, फिर इस बार क्या ग़लती हुई? हैरिस को बस इतना याद रहा कि उन्हें उस झील से निकालकर किसी तरह किनारे तक लाया गया। उनके आसपास नेपाली सैनिक थे।

सैम कहते हैं, ‘वे कुछ बोल रहे थे और मैं नशे में पागलों की तरह उन्हें देख रहा था। अगले कई घंटों तक मैं सेल्फ टॉर्चर सहता रहा। कुछ बचा था तो मुझे हिलाकर रख देने वाला ऐसा डर, जिसे बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। एलएसडी और इसी तरह की कई ड्रग्स बेशक बायोलॉजिकली सेफ हैं, लेकिन इनमें बेहद बुरे और आपकी मन: स्थिति अस्थिर कर देने वाले अनुभव देने की ताक़त भी होती है।’

ड्रग्स से मेडिटेशन तक

सैम ने ज़िंदगी में पहली बार अपने एक दोस्त के साथ जो ड्रग ली, वह थी एक्सटेसी (MDMA)। इसे लेने के कुछ ही देर बाद वह एक अलग दुनिया में थे। वह कहते हैं, ‘मेरी चेतना में जो बदलाव हुए, वे अद्भुत थे। मैं सब कुछ साफ़ देख पा रहा था। इमोशंस का लेवल बढ़ा हुआ था।’

‘अपने दोस्त की बातें सुनते हुए मुझे लगा कि मैं उसकी आंखों के ज़रिए उसके भीतर झांक रहा हूं। इतने ध्यान से मैंने उसकी बात शायद ही कभी सुनी हो। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि वह मेरे बारे में क्या सोच रहा है। मेरा पूरा ध्यान सिर्फ अपने दोस्त पर था। मैं उसकी खुशी निश्छल भाव से महसूस कर पा रहा था। उस वक़्त मुझे जिस प्रेम और अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई, वह ठीक वैसी थी, जिसका बख़ान धर्म-अध्यात्म से जुड़े लोग सदियों से करते आए हैं।’ लेकिन उनमें से ज़्यादातर को यह अनुभव ड्रग्स से नहीं, उपवास या ध्यान से मिलता है। यानी जिस असीम आनंद की दुनिया को हैरिस ने ड्रग्स की वजह से महसूस किया, उसे पाने का दूसरा ज़रिया भी है। केमिकल फ्री ज़रिया, मेडिटेशन का।

हैरिस ने पाया कि नशा आध्यात्मिक अनुभव का रास्ता तो खोलता है, लेकिन वह एक ऐसी उड़ान है, जिस पर आपका वश नहीं होता। आप नहीं जानते कि आप स्वर्ग में पहुंचेंगे या नरक में। सो, उन्होंने मेडिटेशन का रास्ता पकड़ा। दरअसल, एलएसडी भी कुदरती न्यूरोट्रांसमीटर के जरिए आपको एक अलग अनुभव कराती है और ध्यान भी वही काम करता है। लेकिन दोनों में एक बहुत बड़ा फर्क है। एलएसडी एक तेज़ गति वाले रॉकेट से बंधे होना है तो ध्यान हौले-हौले नाव खेना। हैरिस ने भारत और तिब्बत में कई बौद्ध गुरुओं से मेडिटेशन सीखा। एक दिन में 18 घंटे मौन ध्यान करने का अभ्यास किया। महसूस किया कि जिस तरह एक्सटेसी आपको पूरी तरह वर्तमान में मग्न कर देती है। ठीक वैसा ही अनुभव मेडिटेशन में होता है। जब आप ध्यान की एक निश्चित सीमा तक पहुंच जाते हैं तो आपके दिमाग़ में वही केमिकल पैदा होने लगते हैं और आपका मन आनंद की दुनिया में गोते लगाने लगते हैं। हैरिस का कहना है कि वह अब ड्रग्स नहीं लेते। न ही दूसरों को इसे लेने की सलाह देते हैं, लेकिन ड्रग्स को लेकर जिस तरह की धारणाएं समाज ने बनाई हुई हैं, उसे बदलने की ज़रूरत है।

सही जानकारी ज़रूरी

सैम का मानना है कि हमें न सिर्फ ख़ुद को, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी ड्रग्स के बारे में शिक्षित करना होगा। बताना चाहिए कि कौन से ड्रग्स लिए जा सकते हैं, उनके लेने से शरीर और मन पर क्या असर पड़ता है और कौन से बिल्कुल नहीं लेने चाहिए।मुश्किल यह है कि हम इन सभी बायलॉजिकली एक्टिव कम्पाउंड्स को ‘ड्रग्स’ ही कहकर पुकारते हैं, जिसकी वजह से इनके साइकलॉजिकल, मेडिकल और लीगल पक्ष पर कोई भी बौद्धिक बहस करना नामुमकिन हो जाता है। समाज की असल परेशानी है ड्रग एब्यूज़ और उसकी लत। इससे छुटकारा पाने का सिर्फ एक ही उपाय है, इनके बारे में सही ज्ञान और मेडिकल उपचार। ड्रग्स लेने वाले को जेल में बंद कर देना समस्या का हल नहीं है। सैम कहते हैं कि अमेरिका में ऑक्सीकोडोन और डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली पेनकिलर्स इस मामले में सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होती हैं। क्या इन्हें लेना ग़ैरकानूनी नहीं होना चाहिए? क़तई नहीं, लेकिन लोगों को इनकी लत लगने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। मालूम होना चाहिए कि लत लगने पर इलाज की ज़रूरत होती है। हर तरह की ड्रग्स, फिर चाहे वह शराब और सिगरेट ही क्यों न हो, बच्चों से दूर रखनी चाहिए। कुछ ड्रग्स में असाधारण ताक़त होती है, जैसे मैजिक मशरूम्स में पाया जाने वाला सिलोसिबिन और एलएसडी। फिर भी इनका सेवन करने के लिए आपको जेल जाना पड़ सकता है। वहीं तंबाकू और एल्कोहल जैसे ड्रग्स दुनिया की हर सोसायटी में स्वीकार्य हैं। एनबीटी के नवभारत गोल्ड की आर्टिकल में कहा गया है कि सैम हैरिस ने ड्रग्स और मेडिटेशन दोनों के ज़रिए अलौकिक और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की, लेकिन ड्रग्स के बुरे और डरावने अनुभवों ने उन्हें ध्यान की उस गली की ओर मोड़ा जहां आनंद तो उतना ही है, पर नरक भोगने की संभावना कम।

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