अंगदान के अभाव में हर 10 मिनट में एक मौत : हरीश मंत्री

                 (बृजवासी शुक्ल) 

अंगदान से संवरेगा बालकों का जीवन - डॉ. चौबे

 चाइल्डकंजर्वेशन फाउंडेशन की 41 वीं राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

भोपाल। दिल्ली के अनमोल दुनिया में नही है लेकिन उनके अंग आज 34 लोगों के जीवन को सुगम बना रहे हैं। एक व्यक्ति का देहदान 4 से 6 एलोपैथी डॉक्टरों को निपुण बनाने में काम आता है और एक डॉक्टर  औसतन चार हजार लोगों को जीवन देता है।अंगदान मानव जीवन में सबसे अमूल्य है इसके प्रति भारत में व्यापक भ्रांतियां है इन्हें दूर किया जाना चाहिए।अंगदान के क्षेत्र में कार्यरत श्री शिवम संस्था के हरीश मंत्री ने आज यह जानकारी चाईल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 41 वी ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बताई। संगोष्ठी में नागपुर के ख्यात अंगदान मामलों के विशेषज्ञ डॉ रवि वानखेड़े  ने भी संबोधित किए।

मुख्यवक्ता हरीश मंत्री ने बताया कि व्यक्ति की ब्रेन डेथ के बाद अगर उसके अंग दान कर प्रत्यारोपित किये जायें तो करीब 32 लोगों को जीवन दिया जा सकता है।समाज में अंगदान औऱ देहदान के प्रति लोगों में गलत औऱ मिथ्या भ्रांतियां है हमें यह समझना होगा की भारतीय सनातन संस्कृति परोपकार औऱ दान की महत्ता पर ही टिकी है।महर्षि दधीचि इसका उदाहरण है।श्री मंत्री ने बताया कि अंगदान के लिए मोहन फाउंडेशन ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध कराता है।अंगदान के बाद मृत देह को मूल स्वरूप में पैक कर ही परिजनों को वापिस किया जाता है इसलिए इस कार्य में हमें आगे आकर पहल करनी चाहिये।

श्री मंत्री के अनुसार भारत में प्रति दस मिनिट में एक व्यक्ति की मौत अंग प्रत्यारोपण के आभाव में होती है।देश मे प्रतिबर्ष दो लाख किडनी की आवश्यकता होती है लेकिन 6 हजार ही उपलब्ध हो पाती है।पचास हजार लीवर के विरुद्ध 750,छह हजार ह्रदय के विरुद्ध सिर्फ सौ,दो लाख आंखों के विरुद्ध पचास हजार की उपलब्धता है।मौजूदा समय में करीब साढ़े ग्यारह लाख जिन्दगियां अंग दान के लिए प्रतीक्षारत है।एक व्यक्ति का  शरीर अंतिम संस्कार से पहले 42 अंग दान कर सकता है जिनमें ह्रदय,पेनक्रियाज,आंख,गुर्दा,हाथ,अंगुलियों तक शामिल है।श्री मंत्री ने बताया कि अगर किसी मृत शरीर से विहित प्रविधि के तहत किडनी, हृदय, लीवर, लंग्स दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति को प्रत्यारोपित कर दिए जाते है तो औसतन 75 फीसदी लोग पांच से 20 साल तक नई जिंदगी जीते है।उन्होंने बताया कि विकसित देशों में 90 फीसदी अंग दान व्यक्ति की ब्रेन डेथ के बाद जुटाए जाते है जबकि भारत में यह केवल दो फीसदी हैं।उन्होंने चाईल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सभी सदस्यों से आग्रह किया कि समाज में देह औऱ अंग दान के प्रति जागरूकतामूलक अभियान सुनिश्चित करने में आगे आएं।

 नागपुर के ख्यात चिकित्सक औऱ पूर्व सैन्य अफसर डॉ रवि वानखेड़े ने संगोष्ठी में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं अपने एक मुस्लिम मित्र को किडनी दान की है और वे महाराष्ट्र में मोहन फाउंडेशन की मदद से अंगदान के प्रति लोगों को जागरूक कर रहें है। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र ने अध्यक्षीय उदबोधन में कहाकि जब हम लोगों से या प्रकृति से लेने में भरोसा रखते है तो देनें में अलग से सोचने की क़तई आवश्यकता नही है।डॉ राघवेंद्र ने मप्र में फाउंडेशन के माध्यम से अंग एवं देहदान के क्षेत्र में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने के लिए वचनबद्धता व्यक्त की।

फाउंडेशन के सचिव डॉ. कृपाशंकर चौबे ने संगोष्ठी का सफल संयोजन करते हुए बताया कि आधिकारिक प्रतीक्षा सूची के अनुसार करीब 2049 बच्चों की  जिंदगी की आशा अंगदान पर टिकी हुई जिनमे 25 फीसदी पांच साल से कम के है।उन्होंने बताया कि एक जब एक व्यक्ति का मृत देह आठ जिंदगियों में खुशियां बिखेर सकता है तो हमें बगैर पूर्वाग्रह के इस मामले में समाज को समेकित करना चाहिए।डॉ चौबे के मुताबिक अमेरिका 31.96,स्पेन 46.9 प्रतिशत के विरुद्ध भारत में महज 0.86 फीसदी लोग ही अंगदान के लिए आगे आते है। संगोष्ठी में देश भर के 14 राज्यों के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

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