संसदीय उदासीनता का शिकार है "बाल तस्करी औऱ शोषण" का मुद्दा - एनके त्रिपाठी


(विशाल मोदी) 


12 लाख बच्चे वेश्यालयों में जीने को विवश, 3 लाख बच्चे सार्वजनिक रूप से भीख मांगते है, सीसीएफ की दसवीं ई संगोष्ठी सम्पन्न


भोपाल (म. प्र.) । भारत के चुने हुए सांसद, विधायकों की प्राथमिकता में बच्चे नही है क्योंकि, वे वोटर नही होते है इसीलिए संसद में बाल तस्करी और पुनर्वास से जुड़ा हुआ " ट्रेफिकिंग ऑफ पर्सन प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एन्ड रिहविलटेशन बिल 2018 "लोकसभा से पारित होने के बावजूद राज्यसभा में लंबित है। देश के उच्च सदन में कभी इस बिल को पारित कराने की इच्छाशक्ति प्रतिध्वनित नही हुई है।  



मालवांचल विश्वविद्यालय के कुलपति एवं एनसीआरबी के पूर्व डीजी एनके त्रिपाठी ने आज इस मुद्दे को उठाते हुए भारत में बाल तस्करी और जघन्य शोषण पर चिंता व्यक्त की। श्री त्रिपाठी चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की दसवीं ई संगोष्ठी को इंदौर से संबोधित कर रहे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. रूप सिंह ने भी इस सेमिनार में भारत के संवैधानिक प्रावधानों औऱ विकास यात्रा को लेकर अपना मार्गदर्शन दिया। एनके त्रिपाठी ने इस बात पर बेबाकी से अफसोस जताया कि भारत के विधायी संस्थान एवं जबाबदेह लोग बाल तस्करी या पुनर्वास के मुद्दे को अपनी विहित प्राथमिकताओं में शामिल नही करते है। राज्यसभा में लंबित बिल को लेकर उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी सांसद ने आज तक इस बिल को लेकर सवाल इसलिए नही उठाया क्योंकि उनका ध्यान केवल चुनावी राजनीति पर संकेंद्रित रहता है।   



श्री त्रिपाठी ने बताया कि आज बाल तस्करी और शोषण के जो आंकड़े सामने है वह हमारी सामुदायिक चेतना को भी कटघरे में खड़ा करते हैं। 2018 के एनसीआरबी के आंकड़े बताते है कि 67134 बच्चे इस दरमियान गायब हुए और चिंतनीय पक्ष यह है कि मप्र इसमें शिखर पर है जहां आंकड़ा 10038 का दर्ज किया गया है। उन्होंने बताया कि गायब होने वाले 65 फीसदी बच्चों को यौन शोषण की त्रासदी झेलनी पड़ रही है। 10 फीसदी को इसी उद्देश्य से विदेशों में भी तस्करी कर ले जाया जाता है। श्री त्रिपाठी ने बताया कि एक प्रमाणिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 12 लाख बच्चे इस समय वेश्यालयों में फंसे है जो कुल यौनकर्मियों का 40 फीसदी है। करीब 3 लाख बच्चे सार्वजनिक रूप से भिक्षावृत्ति में सलंग्न है। उन्होंने बताया कि भारत में भयंकर गरीबी इस सन्त्रास के लिए जिम्मेदार है। अधिकतर मामलों में मातापिता की रजामंदी ही चाइल्ड ट्रेफिकिंग का अहम कारक है।उन्होंने साफगोई से कहा कि हमारा समाज और तन्त्र वेश्यावृत्ति के कलंक को मिटाना नही चाहता है। इसीलिए इस सुगठित कारोबार के विरुद्ध की जाने वाली कारवाई रस्मी प्रकृति की रहती है।संसद या मीडिया में भी इस विषय पर कभी गंभीर चिंतन या चर्चा हमें सुनाई नही देती है।


सेमिनार को वरिष्ठ कानूनविद डॉ रूप सिंह ने भोपाल से संबोधित करते हुए कहा कि बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को नए कानून के विधिक पक्ष को टिप्स पर याद कर और इसके प्रावधानों का गहराई से अध्ययन करना चाहिए।उन्होंने भारत के संवैधानिक विकास और प्रावधानों पर विस्तार से प्रकाश डाला।


फाउंडेशन की लीगल टीम घोषित


फाउंडेशन के सचिव डॉ. कृपाशंकर चौबे ने आज लीगल सेल की घोषणा करते हुए बताया कि फाउंडेशन बाल हित में भी ज्यूडिशियल फोरमों पर भागीदारी करेगा इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुण सक्सेना दिल्ली के अलावा मप्र उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता विजय पांडे जबलपुर, रूप सिंह को जोड़ा गया है। फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र शर्मा ने दोनों वक्ताओं का आभार प्रदर्शन करते हुए कहाकि बाल अधिकार की चुनौतीयां तमाम कानूनी प्रावधानों के अस्तित्व में आने के बाद कम होने की जगह बढ़ती जा रही है।संगोष्ठी का संचालन डॉ. कृपाशंकर चौबे ने किया।


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