कठिन परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करें पत्रकार : जयन्त मिश्र


बस्ती (उ.प्र.) । पत्रकारिता चुनौतियों और संघर्षों का क्षेत्र है। प्रतिदिन किसी न किसी नई चुनौती का सामना करना होता है। पत्रकारिता दिवस हमें चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा देता है। पत्रकारिता में यह मानकर काम करना होगा, कि कठिनाइयों से हमें रोज सामना करना है । हम समाज के अन्तिम व्यक्ति तक पहुंचते भी हैं और दुश्वारियों को जिम्मेदारों तक पहुंचाते हुए मुश्किलों को दूर करने की कोशिश भी करते हैं। 30 मई को पत्रकारिता दिवस के इतिहास पर नजर डालें तो हमें कठिन परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा मिलती है। 


आज पत्रकारिता दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश सचिव, यूपी न्यूज एजेन्सी के प्रभारी व लोकप्रिय हिन्दी साप्ताहिक राष्ट्र कौशल टाईम्स के संरक्षक जयन्त कुमार मिश्र ने उक्त विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों में ईमानदारी से सफ़लतापूर्वक कार्य करना पत्रकारिता की मूल भावना है। पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। मगर कई लोगों को इस मामले में जानकारी कम है कि हर साल 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस क्यों मनाया जाता है ?   


जयन्त कुमार मिश्र ने कहा कि 30 मई 1826 को हिंदी भाषा में पहला समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड प्रकाशित हुआ था, जिसके कारण इस दिन को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रदेश सचिव ने कहा कि उदण्त मार्तण्ड को कोलकाता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने शुरू किया था। वह खुद ही इस अखबार के प्रकाशक और सम्पादक थे। ऐसे में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत करने का श्रेय पंडित जुगल किशोर शुक्ल को जाता है। उदण्त मार्तण्ड एक साप्ताहिक अखबार था, जो कि हर मंगलवार को प्रकाशित होता था। जिस समय इस अखबार का प्रकाशित करने का काम शुरू हुआ, उस समय बाजार में काफी अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला अखबार मौजूद थे। ऐसे में गुलामी के समय देश में हिंदी पत्रकारिता की नींव डालने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल ही थे। 


भले ही उदण्त मार्तण्ड देश का पहला हिन्दी भाषी अखबार था, लेकिन इसका प्रकाशन ज्यादा समय तक नहीं हो पाया, क्योंकि तब डाक के जरिए अखबार पाठकों तक पहुंचाए जाते थे। उस समय अधिक डाक दर होने की वजह से अखबार प्रकाशित होना बंद हो गया था।     


जयन्त कुमार मिश्र ने कहा कि जब यह अखबार बंद हुआ, तब तक इसके महज 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे। इस मामले में इतिहासकारों का कहना है कि मिशनरियों के पत्र को तो डाक आदि की सुविधा मिली थी, लेकिन उदण्त मार्तण्ड को अपने बेबाक रवैये की वजह से ये सेवा नहीं मिल पाई थी।


श्री मिश्र ने कहा कि बेबाकी पत्रकारिता का मूल मंत्र है। चूंकि इससे सत्ता और व्यवस्था की कमियां उजागर होती हैं, तो हमें नियंत्रण में करने के लिए सुविधाओं में कटौती करते हुए तरह तरह से कठिनाईयां पैदा की जाती हैं। अन्त में श्री मिश्र ने पत्रकारों का आह्वान करते हुए कहा कि सच्चाई और ईमानदारी के बल पर कठिनाइयों से दो दो हाथ करना और वंचितों, पीड़ितों को न्याय दिलाना ही पत्रकारिता का उद्देश्य है।


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