जींद के गांव बने नकली शराब के गढ़ , हो चुकीं दो मौतें 

तारकेश्वर टाईम्स (हि.दै.)
पानीपत । लाॅकडाउन में शराब बिक्री पर रोक है। सरकार का यह फैसला कोरोनावायरस से बचाव के लिए है, क्योंकि शराब से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है। दूसरी बात, ठेकों के बाहर भीड़ जुटती है, जिससे संक्रमण फैल सकता है। लेकिन इस मौके का फायदा उठाते हुए शराब तस्करों ने कच्ची शराब का धंधा फैलाना शुरू कर दिया है। यमुना से सटे 4 जिलों के 60 गांवों के अलावा जींद व सिरसा में घरों व काेठड़ाें तक में भटि्ठयां लगाकर कच्ची शराब बनाई जा रही है और इसे पूरे प्रदेश में बेचा जा रहा है। ऐसा करने वाले न तो शराब बनाने के विशेषज्ञ हैं, न मानकों से इनका कोई लेना-देना है।  



ऐसी शराब से जींद में सप्ताह भर पहले ही दो लोगों की जान चली गई। बीते कुछ समय में ही इससे दर्जनों लोग अस्पताल पहुंच चुके हैं। 1996 से 1998 तक बंसीलाल सरकार ने शराब पर पाबंदी लगाई थी। तब भी देसी शराब का अवैध धंधा चल निकला था। काफी संख्या में लोगों की जानें गई थीं। अब फिर तंत्र सक्रिय हो गया है। पहले खरीदार फिर शराब का काम करने की बात कह अपराधियों से इस पूरे धंधे के बारे में बातचीत की गयी । यमुना किनारे इनका साम्राज्य है कच्ची शराब बनाते तस्करों से बातचीत करने पर चौंकाने वाले मामले सामने आये ।
बताते हैं कि दो लीटर की कोल्डड्रिंक वाली बोतल 400 की देते थे, पर अभी रेट 600 रुपए हो गया है। सप्लाई करने के तरीके के बारे में कारोबारी बताते हैं कि हम ज्यादा दूर नहीं जाते। बेचने वालों से पूरे प्रदेश में संपर्क है। यह काम रात को खेतों के रास्ते होता है। पुलिस लॉकडाउन में व्यस्त है। हम लोगों के कुछ ग्रुप हैं जिनमें पुलिस की लोकेशन आ जाती है।
 अंग्रेजी शराब की असली बोतल में नकली माल
प्रदेश में नकली अंग्रेजी शराब और पुराने बैच की शराब सप्लाई का भी बड़ा खेल चल रहा है। तस्कर अपने घरों में छोटी फैक्ट्री लगाए हुए हैं, जिसके अंदर वो स्प्रिट से शराब बनाकर उसे अंग्रेजी की महंगी बोतलों में भरकर बेच रहे हैं। इस तरह की फैक्ट्रियां कई जिलों में चल रही हैं, जिनमें स्प्रिट से शराब बना रहे हैं। पत्रकारों ने पानीपत में घरों में चल रही ऐसी फैक्ट्रियों का स्टिंग किया तो पता चला कि किस तरह स्प्रिट के अंदर कैमिकल मिलाकर 100 से 200 रूपए के खर्च से 2 हजार तक की बोतल बना देते हैं। जो सेहत के लिए खतरनाक है।    


कच्ची शराब की मांग पूरे प्रदेश में हैं। राजस्थान बॉर्डर से लेकर पंजाब बॉर्डर और दिल्ली तक सप्लाई हो रही है। इसके लिए खेतों के कच्चे रास्तों से सप्लाई का नेटवर्क चल रहा है। बनाने वाले अपना इलाका पार कराती है। बाकी की जिम्मेदारी खरीदार की होती है। सुरक्षा के लिए देसी कट्टों का सहारा लेते हैं। यमुना के रास्ते खेतों से कुंडली बॉर्डर तक जाते हैं, वहां से केएमपी पर ज्यादा सुरक्षा नहीं है। इसलिए यहीं से दिल्ली जाना, झज्जर के रास्ते रोहतक और यहीं से आगे हिसार तक जाना आसान है।
केएमपी से ही राजस्थान बॉर्डर में एंट्री हो जाती है। अम्बाला साइड जाने के लिए यमुना के रास्ते यमुनानगर वाला रूट ज्यादा सक्रिय है। जींद से मध्य हरियाणा में खेतों के रास्ते बाइक और जरूरी सामान वाले वाहनों से सप्लाई हो रही है। नकली अंग्रेजी शराब की सप्लाई का काम फर्जी पास बनवाकर किया जा रहा है। इसे जरूरी सामान वाले ट्रकों आदि से सप्लाई कर रहे हैं।
कच्ची शराब बनाने का तंत्र यमुनानगर, करनाल, पानीपत व सोनीपत के यमुना से सटे 60 से ज्यादा गांवों में सक्रिय है। इनमें हथवाला, रक्सेड़ा, सिंभलगढ़, सनौली, बापौली, नवादा, अराईपुरा, बंदराला, अंचला, लिखेडी, तामशाबाद, कमासपुर, मिर्जापुर, मनौली, दहिसरा, खुरमपुर, जाजल, जपती छपरा, गुमथला, नगली, नगला, प्रलाहदपुर, पोबारी और काकोदा हैं। जींद में भी कच्ची शराब का काम बड़े स्तर पर हो रहा है।
कच्ची शराब जहर है। फोरेंसिक साइंस एक्सपर्ट नागेन्द्र सिंह के अनुसार, इसमें 95% तक अल्कोहल होता है। इसे गन्ने के रस, ग्लूकोज, शीरा, आलू, चावल, जौं जैसे स्टार्चयुक्त पदार्थों के फर्मनटेशन से बनाते हैं। नशीला बनाने के लिए मेथनॉल मिलाते हैं। सामान्य अल्कोहल लीवर के जरिए एल्डिहाइड में बदलती है, ये मिथाइल अल्कोहल फॉर्मेल्डाइड नामक जहर बन जाती है। आखों व दिमाग पर असर होता है। अंधापन जैसे लक्षण उभरने लगते हैं।
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