बड़ा सवाल - क्या जरूरी होता है बवाल - आर.के. पाण्डेय एडवोकेट

तारकेश्वर टाईम्स (हि0दै0)


आज देश के सामने बड़ा विचारणीय प्रश्न है कि क्या सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए बवाल जरूरी होता है ?


 प्रयागराज  ( उ0प्र0 ) । यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ मात्र वोट बैंक के लिए विगत 71 वर्षों से अनवरत जातिवादी व मजहबी खेल चल रहा है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण तथाकथित मजहबी उन्माद, जाट आंदोलन, दलित आंदोलन, समाजवादी चिंतन व रणवीर सेना, भीम आर्मी, जेएमयू, जेएनयू, एएमयू आदि आंदोलन है।



उपरोक्त आंदोलन व प्रदर्शन की आड़ में लोग राष्ट्र की सम्पत्ति का नुकसान तक करते हैं व उससे भी विचित्र बात यह है कि इनमें से अधिकांश का राष्ट्र के विकास में कोई योगदान न होकर केवल सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाना होता है। वहीं दूसरी तरफ तथाकथित सवर्ण जोकि अपने टैक्स से देश का विकास करता है व उसी टैक्स से तथाकथित आंदोलनकारी जातिगत व मजहबी नाम पर आरक्षण व सब्सिडी जैसे लाभ उठाते हैं।
   
यक्ष प्रश्न तो यह है कि जिस जाति के नाम पर नौकरी व सुविधा प्राप्त होती है उसी जाति के नाम पर एससी एसटी की धाराओं में आपराधिक मुकदमे कैसे दर्ज हो जाते है जबकि सवर्ण आज भी चुपचाप 71 वर्षों से अन्याय को झेलते हुए चुपचाप राष्ट्र के विकास में योगदान दे रहा है। 


  बता दे कि उपरोक्त सवाल इसलिए खड़ा होता है कि जो मीडिया एक जाति व धर्म के नाम पर चटपटी खबरे चलकर टीआरपी की होड़ मचाता है वह भी सवर्ण अधिकारों के प्रति खामोश है जबकि सवर्ण समाज के तथाकथित ठेकेदार भी सेवा के नाम पर लाभ प्राप्त जातियों को ही मेवा बांटते हैं। अगर यह सच नही तो पूरे राष्ट्र को चैलेंज है कि बताईये कि विगत 71 वर्षों में किस दलित, ओबीसी या अल्पसंख्यक नेता व समूह ने गरीब, मजबूर, असहाय, पीड़ित, शोषित सवर्ण समाज के भलाई के लिए कोई आवाज उठाई हो।
  ताजा प्रकरण रविन्द्र जठेड़ी के द्वारा जातिगत आरक्षण के विरुद्ध विगत महीने से दिल्ली में किया जा रहा सत्याग्रह आंदोलन है जिसे न तो सवर्ण समाज के तथाकथित ठेकेदारों ने महत्त्व दिया व न ही सरकार व राजनैतिक दलों ने जबकि मीडिया तो हमेशा की तरह खामोश है।


  आज सरकार, राजनैतिक दल, नेतागण, समूह व मीडिया को खुद में विचार करना चाहिए कि क्या वे भारतीय संविधान की मूल भावना के विरुध्द जाकर आरक्षण व अल्पसंख्यक के नाम पर जातिवाद व मजहबी उन्माद को बढ़ावा नही दे रहे है व क्या वह निष्पक्ष हैं? याद करिये यदि अन्य समूहों की तरह ही समूचा सवर्ण समाज एकस्वर से अपने हितों के रक्षार्थ खड़ा हो गया व इन जातिवादी व मजहबी तत्वों को बढ़ावा देने वाले राजनैतिक दलों, समूहों व मीडिया का परित्याग करके तथाकथित भीम आर्मी, रणवीर सेना, जाट आंदोलन, जेएनयू, जेएमयू, एएमयू आदि के तथाकथित आंदोलन की राह पकड़ा तो क्या होगा?


  अतएव आज जरूरत है कि जातिवाद के बजाय भारतीयता अपनाएं व सभी गरीब, बेसहारा पात्र भारतीयों का विकास कराये तथा अधिक अंक पर  अंक को तरजीह न देकर योग्यता का सम्मान करें जिसे रास्ता रसातल के बजाय विकास की तरफ जाए व आपसी सौहार्द कायम रहे।


आगे आएं, परिवर्तन लाएं ।
राष्ट्र में सही सौहार्द बनाएं ।।
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