फूल खिला हो , भंवरा न हो तो सुगंध की कीमत ?

तारकेश्वर टाईम्स  (हि0दै0)


फूल खिला हो, नगर के बीचोंबीच खिला हो , पर मधु का अभिलाषी भंवरा न हो , तो बिखरती सुगंध की कीमत कौन करे ? सूर्य निकला हो , सुंदर परिदृश्य हो, पर देखने वाली आँख ही न हो, तो प्रकाश की कीमत क्या रहे ? कितनी ही अमृततुल्य वर्षा हो, पर भूमि ही बंजर हो, तो अन्न कैसे उपजे ?



योंही आत्मज्ञानी महात्मा तो उपलब्ध हों , सुलभ हों , पर मुमुक्षु शिष्य न हों, तो ज्ञान परंपरा आगे कैसे बढ़े ?
चर्चा चलती है , कि गुरू कैसा हो ? यह विचार तो एक ओर है, जरा दूसरी ओर भी तो देखो कि शिष्य कैसा हो? रामकृष्ण ने नरेन्द्र को पैर के अंगूठे से छू दिया तो विवेकानन्द पैदा हुआ। विचार करो कि क्या रामकृष्ण के पास एक नरेन्द्र ही पहुँचा? गए तो बहुत, पर सब विवेकानन्द नहीं बने। रामकृष्ण के सामर्थ्य का बात नहीं है, लाख नरेन्द्र होते तो लाख विवेकानन्द बनते , बात नरेन्द्र की है । नरेन्द्र तो एक ही था।
"हमें तो रामकृष्ण जैसे गुरू चाहिएँ" ऐसा कहने वाले अपने भीतर भी तो झाँक कर देखें, कि वे नरेन्द्र हैं क्या? और रहस्य यह है कि आप नरेन्द्र हो जाओ, तो रामकृष्ण सदा यहीं हैं। भगवान अपने से व्यवस्था करते हैं।
"मैं संत को पहचानूं कैसे ?" मेरे भैया ! संत को पहचानने की फिक्र में मत पड़ो, अपने साधकपने को पहचानो। भीतर प्यास दृढ़ हो, तो भगवान संत से मिला भी देते हैं, उनकी पहचान भी करा देते हैं।
अश्रद्धावान, दोषदृष्टि वाला, चंचलबुद्धि, मनमुखी, तोताजिव्हा, व्यसनी, लोभी, आलसी और लंपट शिष्य तो न ही हों तो अच्छा है। वे तो अपने जीवन, अपनी विद्या और अपने गुरू को भी कलंकित ही करते हैं।
लोकेशानन्द की सनद है कि शिष्य सच्चा मुमुक्षु हो, तो वे सद्गुरू, थोड़ी सी ही सेवा से प्रसन्न होकर, उस शिष्य को, हीनता, दीनता, दरिद्रता और दुख से, सदा सदा के लिए छुड़ाकर, परब्रह्म की प्राप्ति करा देते हैं।
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