इस नववर्ष और क्रिसमस से दूर रहें @ नव सम्वत स्वागत समिति

तारकेश्वर टाईम्स  (हि0दै0)



   ( ऋषभ शुक्ल )  बस्ती  ( उ0प्र0 ) । एक जनवरी का नववर्ष और हमें पश्चिमी सभ्यता की ओर ले जाता है । हमारा समाज उस ओर जा रहा है जब हम अपनी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जानें या न जानें लेकिन जनवरी के हैप्पी न्यू ईयर पर शराब के साथ विभिन्न तरीकों से हुड़दंग करना नहीं भूलते । इसके साथ क्रिसमस की बधाइयाँ भी जोर शोर से ऐसे समाज में देते हैं , जहाँ क्रिसमस का न औचित्य है , न ही मनाया जाता है । हमें यह समझना चाहिए कि जिस समय क्रिसमस मनाया जाता है और अंग्रेजी नववर्ष की तैयारियां की जाती हैं , इसी बीच 21 से 27 दिसम्बर के मध्य ही गुरु गोविन्द सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था । हमें अपनी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति जन जागरूकता के साथ अलख जगाना होगा ।



   नव सम्वत स्वागत समिति बस्ती ने विगत वर्षों से इसके लिए जनमानस को जागरूक करते हुए इस नववर्ष और क्रिसमस से दूर रहते हुए बलिदानियों को याद करने और अपनी सभ्यता , संस्कृति को अक्षुण्य बनाए रखने के संकल्प के साथ जन जागरण अभियान चलाया है । नव सम्वत स्वागत समिति के माध्यम से भारतीय सनातन सभ्यता और संस्कृति के प्रचार-प्रसार और ईसाई पर्व - त्योहारों के प्रति अपने सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए समाजसेवी अखिलेश दूबे , डाॅ0 वीरेन्द्र त्रिपाठी , कैलाश नाथ दूबे और भृगुनाथ त्रिपाठी  ( पंकज ) सहित तमाम बुध्दिजीवियों ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त की है । नव सम्वत स्वागत समिति लगातार जन मानस से इस तरह के पर्व एवं त्योहारों को महत्व न देते हुए नकारने का आग्रह करता आ रहा है । इतिहास साक्षी है कि जब भी हमने विचारों का आदान प्रदान बन्द किया है , तब तब हम अलग हुये हैं , कमजोर हुये हैं ।



 आज भी स्थितियाँ कुछ ऐसी ही हैं , भारत भूमि पर अंग्रेजों ( ईसाईयों ) द्वारा धर्मपरिवर्तन आदि माध्यम से जिस तरह से कब्जा किया जा रहा है , जिस तरह से ईसाईयत का प्रचार किया जा रहा है , उससे साफ जाहिर है कि भविष्य बड़ा अच्छा नही है । हम पश्चिमी सभ्यताओं के अंधानुकरण में स्वयं को भूल गये हैं । हम भूल गये हैं , कि जब सूर्य पूरी तरह से पश्चिम में जाता है , तो अस्त हो जाता है । हमने अपने पूर्वजों ( शहीदों ) के बलिदानों को भुला दिया । हमारा समाज गुरू गोविन्द सिंह जी के बलिदान को कभी नहीं भुला सकता । हमें समझना चाहिए कि जिस समय हमारे देश में अन्याय के विरुद्ध त्याग और बलिदान का इतिहास हो , ऐसे समय में हमें अपनी संस्कृति के प्रति कितना सजग रहना चाहिए । आधुनिकता के नाम पर एक जनवरी को नये वर्ष का उत्सव शराब , फूहड़ गीतों आदि के साथ मनाना शुरू कर दिया गया , यीशू के बारे में भले ही कुछ न जानते हों , लेकिन क्रिसमस की बधाई हम अंग्रेजों से पहले देने लगे । अंग्रेज चैन से सोते रहे और हम 31 दिसम्बर को शराब पीकर नाचते रहे । हमें लगा कि हम कितने आगे निकल गये । यह हमारे समाज के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है ।


  हमारे राष्ट्र प्रेमी सज्जनों ने समय की गम्भीरता को समझा और भारतीय संस्कृति और भारत माता के हित में क्रिसमस और अंग्रेजी नव वर्ष को उत्सव के रूप में न मनाने के साथ ही इसका बहिष्कार करने के लिए समाज में जन जागरण चलाने का दायित्व लिया है । ऊपर चार सुधी बुद्धिजीवियों के नाम लिये हैं , यह संख्या सैकड़ों में है और समाज के बड़े वर्ग का समर्थन मिल रहा है । इस अभियान का नेतृत्व अखिलेश दूबे कर रहे हैं । 


 नव सम्वत स्वागत समिति ने पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी नव वर्ष की बधाइयों को नकार कर , क्रिसमस के त्योहार को ठुकरा कर इस बात का परिचय दिया है , कि आज भी वह अपनी संस्कृति , सभ्यता आदि को लेकर गम्भीर हैं और सजग भी । भृगुनाथ त्रिपाठी "पंकज" कहते हैं अच्छा लग रहा है कि इस वर्ष बस्ती , बलरामपुर , गोंडा , संतकबीरनगर एवं अयोध्या समेत कई जिलों में क्रिसमस के त्योहार मनाये जाने में कमी आ रही है । धीरे धीरे अंग्रेजी नव वर्ष पर लोगों ने बधाइयाँ देना बंद कर दिया , पूरे शहर में इक्का दुक्का जगहों को छोड़कर कहीं भी डीजे आदि की कानफोड़ू  आवाज नही सुनाई देती । ये सब बदलाव के शुभ संकेत हैं, जो समाज के सहयोग से सम्भव हो पा रहा है ।



कैलाश नाथ दूबे कहते हैं कि मन तो करता है कि आप सभी का बार बार वंदन करूँ लेकिन अभी बदलाव का एक कदम ही है । ये , अभी शुरुआत है , अभी तो हम थोड़े से बुद्धिजीवी लोगों तक ही अपने विचारों के रूप में पहुँच पाये हैं । अभी बड़ी संख्या में काले अंग्रेज बने हमारे भाई घूम रहे हैं । भारतीय संस्कृति , भारतीय नव सम्वत व भारतीय काल गणना जिसपर पूरा खगोलशास्त्र चलता है उसे जन जन तक पहुंचाना है । जिससे कि प्रत्येक भारतीय स्वप्रेरित होकर इस अभियान का हिस्सा बनेगा और एक आदर्श समाज का उदाहरण प्रस्तुत करेगा ।


नव सम्वत स्वागत समिति सभी भारतीय जनों से विनम्र निवेदन करता है  कि आप इस क्रिसमस और अंग्रेजी नव वर्ष के उत्सव को ईसाइयों तक ही रखने का प्रयास करें और धर्मांतरण आदि खतरों से भारत को बचाएं ।


   राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है : -
"जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है ।
वो नर नही है पशु निरा है और मृतक समान है ।।
( कवि के इस मर्म को हर भारतीय नागरिक को समझना ही होगा )     - जय हिन्द 


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