अयोध्या पर सुप्रीम मुहर- विवादित भूखण्ड रामलला विराजमान का, वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ भूखण्ड 


                ( के0 के0 उपाध्याय )
नई दिल्ली ।   सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को सर्वसम्मति के फैसले में अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और केन्द्र सरकार को निर्देश दिया कि नयी मस्जिद के निर्माण के लिये सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ का भूखंड आवंटित किया जाए । प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस व्यवस्था के साथ ही राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील 134 साल से भी अधिक पुराने इस विवाद का पटाक्षेप कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट कह दिया कि अयोध्या की विवादित ढांचे वाली जमीन पर राम मंदिर बनेगा।



अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने 1045 पन्नों के अपने फैसले में रामलला विराजमान को विवादित भूमि सौंपी और मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया। इसी के साथ ही मस्जिद बनाने का इंतजाम भी कर दिया। रामलला विराजमान को विवादित भूमि सौंपने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा भी खारिज कर दिया। साथ ही सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को किसी दूसरे जगह पांच एकड़ भूमि देने का आदेश दिया है।


अयोध्या की विवादित जमीन के मालिकाना हक की लड़ाई आज से लगभग 135 साल पहले यानी सन 1885 में शुरू हुई थी। लेकिन, इस मामले में हिंदू पक्ष ने रामलला विराजमान को भी एक पक्ष बनाने का फैसला 1989 में लिया था। बता दें कि रामलला विराजमान को भी एक पक्ष बनाने की पहल प्रसिद्ध वकील और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल लाल नारायण सिन्हा ने की थी।



भारतीय कानून के अनुसार हिंदू देवता मुकदमा दायर कर सकते हैं और उनके खिलाफ भी मुकदमा चल सकता है। उन्हें एक 'न्यायिक व्यक्ति' माना जा सकता है। अयोध्या के भगवान राम को शिशु रूप में माना जाता है , जो कानून के तहत नाबालिग हैं । ऐसे में रामलला विराजमान स्वंय भगवान हैं जिन्हें कोर्ट ने जमीन सौंप दी है।


जब रामलला पहली बार बने अयोध्या मामले के पक्षकार
जन्मभूमि वाले मुकदमे में भगवान राम का प्रतिनिधित्व कोर्ट में उनके मानव मित्र विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता त्रिलोकी नाथ पांडे ने किया। दीवानी अदालत से इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा स्थानांतरित होने के दो साल बाद 1989 में रामलला पहली बार वादी बने।1989 में ही आम चुनाव से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल ने एक याचिका दायर की थी, जो मालिकाना हक मामले में भगवान राम के जन्मस्थान के केस में मित्र बनने की मांग की थी। वह उस समय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकारी अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने दावे में कहा था कि भगवान राम ही इस संपत्ति के असली मालिक हैं।



सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि का अधिकार देवता रामलला विराजमान को सौंपा जाएगा। हालांकि यह कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।


बता दें कि अगस्त 2019 को अदालत ने इस मुद्दे की दैनिक सुनवाई सुनिश्चित की और 16 अक्तूबर तक 40 दिन की मैराथन सुनवाई के बाद अपना अंतिम फैसला नवंबर में सुनाने की तारीख दी थी। इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनी। सुप्रीम कोर्ट के लंबे फैसले में कुछ ऐसे तर्क रहे, जिनके आधार पर अयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ।




अयोध्या मामले में शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले अयोध्या समेत देश भर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। साथ ही यूपी, दिल्ली, बिहार, राजस्थान समेत देश के कई राज्यों में स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। फैसले के बाद शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है और सोशल मीडिया पर भी निगरानी रखी जा रही है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाए जाने के मद्देनजर देश के लोगों से शांति बना रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि हम सबको मिलकर सौहार्द बनाए रखना है।


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